एस.आर. रंगनाथन (S.R Rangnathan) रंगनाथन ने वर्गीकरण पद्धति
एस.आर. रंगनाथन (S.R Rangnathan) रंगनाथन ने वर्गीकरण पद्धति
6. गणितीय चिन्ह (Mathematical Symbols) जैसे- (+) प्लस, (-) माइनस, इत्यादि । 5. अंकन के गुण (Qualities of Notation) | उत्तम वर्गीकरण पद्धति वही हैं, जिसमें प्रत्येक प्रलेख को पृथक करना सम्भव है । ज्ञान की प्रत्येक शाखा एवं उप-शाखा को समान पद प्रदान करने के लिये अंकन के कुछ आधारभूत गुणों का होना आवश्यक होता है । पुस्तकालय विज्ञान के प्रमुख विद्वान भी अंकन के गुणों के बारे में एकमत नहीं हैं, जो निम्न विवरण से स्पष्ट होता है:बरबिक सेयर्स।
सेयर्स के अनुसार अंकन में संक्षिप्तता (Brevity), सरलता (Simplicity), लचीलापन (flexibility), तथा स्मृति सहायक (Mnemoncis) का गुण होना चाहिए ।
एच. ई. ब्लिस (H.E. Bliss)
ब्लिस के अनुसार 'अंकन वर्गीकरण को बनाता नहीं अपितु उसे बिगाड़ सकता, है' ।। ब्लिस हारा प्रतिपादित अंकन के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं:
1. अंकन को जितना संभव हो सरल होना चाहिये ।
2. अंकन की रचना परिचित प्रतीकों हारा ही की जानी चाहिये । 3. जितना संभव हो अंकन को छोटा होना चाहिये । 4. स्मृति सहायक का प्रयोग यदा-कदा किन्तु व्यवस्थित होना चाहिये की वर्गीकरण में प्रयुक्त सिद्धान्तों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े । 5. समायोज्य से सहसम्बन्धित प्रसरणशील होना चाहिए ।एस.आर. रंगनाथन (S.R Rangnathan) | रंगनाथन ने वर्गीकरण पद्धति की अंकन प्रणाली में किस प्रकार का अंकन किया जाना चाहिये । इसके मार्ग दर्शन हेतु उपसूत्र प्रतिपादित किये हैं । जो अंकन के अच्छे व बुरे गुणों को परिलक्षित करते हैं । रंगनाथन का आरम्भ में यह मत- था कि अंकन के आवश्यक गुण संक्षिप्तता (Brevity), विशेषता (Uniqueness) तथा स्पष्टता (Expressiveness) हैं । लेकिन अपने शोध कार्य, अध्यापन तथा व्यावहारिक अनुभव पर रंगनाथन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अंकन के आवश्यक तथा वांछित गुण इस बात पर निर्भर करते हैं कि1. उनका प्रयोग व्यक्तिगत उद्देश्य की पूर्ति हेतु अस्थाई रूप में किया जा रहा है अथवा सार्वजनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थाई रूप से । 2. वर्गीक की संक्षिप्तता प्रलेखन कार्य में आवश्यक नहीं है ।
3. वर्गीक लिखने की गति के लिये यह आवश्यक है कि वर्गीकरणात्मक भाषा तथा उसकी
प्रयोग करने की विश्व प्रकार स्मरणशीलता सरल हो । 4. वर्गीक का सरल उच्चारण से अधिक महत्वपूर्ण सह-विस्तृत वर्गीक का होना हैं । 5. वर्गीक के सरलता से प्रयोग के लिये उसे खण्डों में विभाजित किया जाना चाहिये, तथा 6. प्रत्येक खण्ड (जिसे पक्ष Fact) कहा जाता है) में अपनी विशिष्टता को स्पष्ट करने की
क्षमता होनी चाहिये ।।
उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एक अंकन में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है ।
1. सरलता (Simplicity)
अंकन यथा संभव सरल होना चाहिए | सरलता दो निश्चित विशेषताओं की ओर संकेत करती है ।पहला, अंकन ऐसा होना चाहिए जिसके हारा अनुक्रम की स्पष्ट रूप से जानकारी मिल जाये | जैसे- हिन्द-अरबी अंक 1 से 9 व 0, तथा रोमन अक्षर A से Z स्वत: ही अपने अनुक्रम को व्यक्त कर देते हैं । इनके अनुक्रम को सभी जानते हैं । दूसरा, यह कि अंकन ऐसा होना चाहिए जिसका सरलता से उच्चारण किया जा सके, याद रखा जा सके, लिखा या टाइप किया जा सके । अंकन की सरलता बहुत सीमा तक उसके लिये प्रयुक्त प्रतीकों व चिन्हों के आकार प्रकार (बनावट) पर भी निर्भर करती है । दशमलव वर्गीकरण (डी.डी.सी.) के अंकन एक ही प्रकार के प्रतीकों (हिन्द-अरबी चिन्ह 0 से 9) से निर्मित होने के कारण सभी दृष्टियों से सरल हैं । जबकि विबिन्दु वर्गीकरण (सी.सी.) का अंकन विभिन्न प्रतीकों से निर्मित होने से अपेक्षाकृत कठिन है ।
2. संक्षिप्तता (Brevity)
संक्षिप्तता अंकन का एक वांछनीय गुण है । अंकन की संक्षिप्तता उसके आधार के विस्तार पर निर्भर करती है । अंकन का आधार जितना विस्तृत होगा, उस वर्गीकरण पद्धति की वर्गीक संख्या उतनी ही छोटी होगी यदि अंकन का आधार छोटा होगा तो वर्गीक बड़ा होगा । सी.सी. के अंकन का आधार विस्तृत है- इसलिए केवल एक ही अंक हारा वर्ग संख्याओं का निर्माण सम्भव हुआ है । किन्तु डी.डी.सी. का आधार छोटा है- अत: इसके वर्गीक कम से कम तीन अंकों का बनता है।अंकन जितना छोटा होगा उतना ही उसे पढ़ना या उच्चारण करना व याद करना आसान होगा । इसके अतिरिक्त पुस्तकालय कर्मचारी को विभिन्न स्थानों जैसे-तिथि पर्णी, आख्या पृष्ठ, सूची-पत्रक इत्यादि पर अंकन में लिखने में सुविधा होती है । |
ग्राह्यता / लचीलापन (Hospitality | Flexibility)
अंकन की वर्धनशीलता पर ही वर्गीकरण पद्धति की सम्पूर्ण सफलता आधारित है । अर्थात अंकन ऐसा होना चाहिए जो ज्ञान के क्षेत्र में निरन्तर उत्पन्न होने वाले नये विषयों, उपसर्गों व विचारों को वर्तमान अनुक्रम में समुचित स्थान प्रदान करने की क्षमता रखता हो ।ब्लिस का कथन है कि अंकन समायोजन (Adjustable) से सहसम्बन्धित Correlation) प्रसरणशील होना चाहिए ।
कोलन क्लैसीफिकेशन (सी.सी.) में पंक्ति एवं श्रृंखला में पूर्ण ग्राह्यता प्रदान करने हेतु विभिन्न विधियों (Devices) का प्रावधान है । डी.डी.सी. श्रृंखला (Chain) में ही ग्राह्यता संभव है, जिसके कारण समकक्ष वर्गो(Co-Ordinate Classes) को भी श्रृंखला (Chain) में ही स्थान देना पड़ता है |
4. अभिव्यंजकता (Expressiveness)
अंकन को वर्गीकरण पद्धति के वर्गों की विभाजन क्रम परम्परा (Hiearchy) को प्रदर्शित करना चाहिए | वर्गों की विभाजन क्रम परम्परा में अंकन को देखने से यह पता लग जाना चाहिये कि किसी प्रधान वर्ग के अधीनस्थ वर कौन-कौन है प्रधान वर्ग की विशेषता को सूचित करने वाला अंक उसके सभी अधीनस्थ वर्गों (Sub-Ordinate Classes) में भी होना चाहिए जिससे अधीनस्थ वर्ग, प्रधान वर्ग के रूप में दिखाई दे। उदाहरणस्वरूप -Science 54
Chemistry 54.6
Inorganic Non-metals
Halogens
5. संश्लेषणत्मकता (Synthesis)
अंकन इस प्रकार का होना चाहिए कि विषय के विभिन्न पदों का आसानी से संश्लेषण किया जा सके और इस संश्लेषण में प्रत्येक पक्ष की संरचना स्पष्ट रूप से दिखाई देती रहे । परिगणनात्मक (Enumerative) एवं पक्षात्मक (Faced) दोनों प्रकार के वर्गीकरण पद्धतियों में इस प्रकार की विशेषता पाई जाती है । यद्यपि पक्षात्मक पद्धति में संश्लेषण की क्षमता ज्यादा होती है । डी.डीसी. पद्धति परिगणनात्मक होने के कारण, इसके अंकन में संश्लेषणात्मकता कम है, जबकि सी.सी. एक पक्षात्मक पद्धति है, अत: इसके अंकन में संश्लेषणात्मकता ज्यादा है । गहन वर्गीकरण के लिए अंक में संश्लेषात्मकता का गुण अत्यन्त आवश्यक है । डी.डी.सी. यू.डी.सी एवं सी.सी. में सामान्य एकलों (Common Isolates) की सहायता से मिश्रित वर्गीक (Compound Numbers) बनाये जाते हैं । सामान्य एकल (Common Isolates) संश्लेषण का कार्य करता है । सी.सी. में मिश्रित वर्गीक (Compound Number) का निर्माण विश्लेषण और संश्लेषण के दारा किया जाता है । यौगिक विषय (Compound Subjects) को सर्वप्रथम उसके विभिन्न पक्षों में विश्लेषण किया जाता है, और उसके बाद उसका संश्लेषण PMEST के निर्धारित क्रम के अनुसार किया जाता है ।Also Check:
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