What do you know about the Economic life of Indian people during Gupta age.
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(2) बौद्ध धर्म - गुप्त काल से पहले भारत में बौद्ध धर्म का बोलबाला था, लेकिन गुप्त सम्राटों के वैष्णव धर्मावलम्बी होने के कारण इस युग में बौद्ध धर्म उस प्रतिष्ठा और महत्त्व को प्राप्त न कर सका जो अशोक और कनिष्क के शासन में उसे प्राप्त था। लेकिन यह कहना उचित नहीं कि इस धर्म के मानने वालों की संख्या भारत में बहुत कम थी। चीनी यात्री फाह्यान के विवरण से पता चलता है कि यह धर्म कश्मीर, पंजाब और अफगानिस्तान में बहुत लोकप्रिय था। उसने देखा था कि इन प्रदेशों में हजारों बौद्ध विहार विद्यमान थे जिनमें लाखों की संख्या में भिक्षु और भिक्षुणियाँ रहती थी ।
(2) गुप्तकाल में बौद्ध धर्म -
सम्भवत: शेष भारत में बौद्ध धर्म अवनति की ओर अग्रसर होने लगा था. इस तथ्य की पुष्टि फाह्यान करता है। उसके अनुसार पूर्व प्रसिद्ध बौद्ध केन्द्र कपिलवस्तु, श्रावस्ती और वैशाली इस समय क्षीण दशा में थे। कुछ विद्वानों के अनुसार यह अपनी प्रसिद्धि राजनीतिक कारणों से खो रहे थे न कि बौद्ध धर्म की अलोकप्रियता के कारण। उनके विचारानुसार अब पाटलिपुत्र और उज्जयिनी विशाल गुप्त साम्राज्य की राजनीतिक गतिविधियों के दो प्रमुख केन्द्र बन चुके थे। इस काल में भी बौद्ध गया, अजन्ता, एलोरा, कालें, कौशाम्बी, सारनाथ आदि बौद्ध धर्म एवं संस्कृति के मुख्य केन्द्र थे । इस काल ( 5वीं शती के पूर्वार्द्ध में) बौद्ध घोष नामक प्रसिद्ध विद्वान हुआ है। उसने विसुद्धिभग नामक बौद्ध ग्रंथ की रचना की एवं त्रिपिटक के अनेक अंशों पर महत्त्वपूर्ण टीकायें लिखी। गुप्त युग में महायान धर्म का अधिक प्रचार रहा। इस तथ्य की प्रमाणिकता महावस्तु, ललित विस्तार, जातकमाला और दिव्यावदान से स्वत: सिद्ध हो जाती है। इन ग्रंथों में से अन्तिम दो ग्रंथ निश्चय ही गुप्त युग में लिखे यद्यपि बौद्ध धर्म को गुप्त राजाओं का संरक्षण प्राप्त नहीं था परन्तु उन सम्राट ने इस धर्म के प्रति सहिष्णुता की नीति जारी रखी ।
गुप्तकाल में बौद्ध धर्म के पतन के कारण
परम भागवत चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य को सेनापति आपका देव वयं बौद्ध था। कुमार गुप्त प्रथम के शासनकाल में मनकुलर में महात्मा बुद्ध की एक मूर्ति का निर्माण हुआ था। शिल्पी संघों और व्यवसायी वर्ग में बौद्ध विहारों, गुफाओं और मठों को संरक्षण प्रदान किया। नालंदा का बौद्ध विहार, बौद्ध परम्पराओं के अनुसार पाँचवीं शदी ई. में शक्रादित्य (कुमार गुप्त प्रथम) द्वारा स्थापित किया गया था और अतिरिक्त भवनों और अन्य दानों के साथ बुद्ध गुप्त, बालादित्य और दूसरे गुप्त नरेशों के नाम जुड़े हुए हैं। इतना होने पर भी इसमें संदेह नहीं कि बौद्ध धर्म की पुरानी सजीवता नष्ट प्राय हो चली थी और ह्रास के लक्षण प्रकट होने लगे थे। फाह्यान का यह कथन कि हास का कोई चिन्ह नहीं दिखाई देता था अक्षरशः सत्य नहीं माना जा सकता। इस धर्म का पतन चार कारणों से इस काल में स्वाभाविक हो गया था वे थे।
(1) राज्याश्रय का अभाव।।
(2) बौद्ध संघों में मुख्यत: महायान संघों में भ्रष्टाचार का प्रवेश ।।
(3) बौद्ध देवी देवताओं का ब्राह्मण धर्म के विस्तीर्ण अंचल में समावेश जिसने बुद्ध तक को रख लिया।
(4) धीरे-धीरे व्यापार की अवनति होने पर व्यापारी वर्ग का सहयोग कम हो गया।
गुप्तकाल में जैन धर्म -
जैन धर्म बौद्ध धर्म की तरह अवनति के मार्ग पर अग्रसर नहीं था इस काल में यह धर्म स्वतंत्र रूप से प्रगति करने में सफल हुआ । श्वेताम्बर सम्प्रदाय की दो प्रसिद्ध महासभायें गुप्त काल में ही हुई। पहली महासभा बल्लभी में (313 ई) आचार्य नागार्जुन (जैन) तथा दूसरी महासभा (453 ई. में) बल्लभी में ही आचार्य क्षमा श्रमण के सभापतित्व में की गई। इन महासभाओं में यह निश्चय किया गया कि जैन धर्म के मान्य ग्रंथों के शुद्ध पाठ कौन से हैं और जैन धर्म के कौन कौन से ग्रंथ प्रमाणित हैं। श्वेताम्बर सम्प्रदाय मुख्यतया पश्चिमी भारत में प्रचलित था। बल्लभी और मथुरा उसके सर्व प्रधान केन्द्र थे । दिगम्बर सम्प्रदाय मुख्यतया पूर्वी भारत में था। पुण्डवर्धन नगर (बंगाल) इसका प्रमुख केन्द्र था । इस युग में जैन ग्रंथों की रचना संस्कृत में हुई । छठी शताब्दी में उमास्वाति ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ तत्वार्थधिगम सूत्र की रचना इसी भाषा में की थी। इसी तरह से सिद्धसेन ने न्यायावतार एवं द्वात्रिशिकाएं संस्कृत में ही लिखी।
इस युग के अनेक अभिलेख इस बात का प्रमाण देते हैं कि गुप्तकाल में जैन धर्म का प्रचार कार्य जारी रहा। मथुरा के एक लेख (गुप्त सम्वत 113) से हमें पता चलता है कि एक जेन महिला द्वारा हरिस्वामिनी जैन मूर्ति का दान किया गया। इसी तरह उदयगिरी गुफा के एक अभिलेख से जानकारी मिलती है कि शंकर नामक व्यक्ति ने पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित करायी । इसी प्रकार से सम्राट स्कन्दगुप्त के काहोम अभिलेख में भद्र नामक व्यक्ति द्वारा आदिकर्तन की प्रतिमा स्थापना का उल्लेख आया है। उत्खनन से मथुरा के समीप गुप्तकालीन अनेक जैन प्रतिमायें प्राप्त हुई हैं। दिगम्बर सम्प्रदाय का अधिक प्रभाव दक्षिण भारत के कर्नाटक और मैसुर जिले में था। यहाँ के कदम्ब और जैन वंश के शासकों ने जैन धर्म को आश्रय दिया था।
(4) धार्मिक सहिष्णुता का उदय
सम्पूर्ण गुप्त युग की धार्मिक स्थिति पर यदि एक साथ दृष्टिपात किया जाये तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राजा और प्रजा सभी धार्मिक सहिष्णुता में न केवल विश्वास ही करते थे वरन् उसका पालन करते थे। इस काल में विभिन्न सदाय के लोगों में परस्पर विद्वेष था। ऐसा लेश मात्र भी आभास नहीं होता। शुत सारों ने विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई । हम बौद्ध तथा जैन धर्म के अनुयायियों को सताने के कोई भी उदाहरण नहीं पाते । इसका एक कारण बौद्ध धर्म के चरित्र में परिवर्तन भी था । बौद्ध धर्म ने हिन्दू धर्म की अनेक विशेषतायें अपना ली थीं।
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