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What do you know about the date and achievements of Kharavela.

What do you know about the date and achievements of Kharavela.

अथवा खारवेल के चरित्र तथा उपलब्धियों कर विवेचन कीजिए। Discuss the carier and achievements of Kharavela.
अथवा निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।। (i) खारवेल
(ii) रुद्रदामन

(ii) Rudradamana. (i) Kharavela
अथवा कलिंग के शासक खारवेल के इतिहास का विवेचन कीजिए। Discuss the history of Kharavela ruler of Kalinga.

उत्तर कलिंग का खारवेल और उसकी उपलब्धियाँ
अपने शासन काल के 12वें वर्ष में ही खारवेल ने पुनः दक्षिण की ओर कूच किया और पाण्ड्य देश के राजा पर आक्रमण किया। इस देश के सम्राट को पराजित कर खारवेल ने यहाँ से भी बहुत भारी संख्या में हाथी, घोड़े और बहुमूल्य हीरे, जवाहरात प्राप्त किये। पाण्ड्य देश की विजय के पश्चात् कलिंग नरेश खारवेल की वृत्ति आक्रमण से हटकर धर्म की और लग गई और शेष जीवन को उसने शान्तिपूर्ण तरीके से व्यतीत किया। खारवेल के विजय अभियान की एक विशेषता रही कि उसने जीते हुए राज्यों को अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया वरन् वहाँ से विपुल धन सम्पदा प्राप्त कर ही इतिश्री की । | खारवेल के निर्माण कार्य कलिंग सम्राट खारवेल कुशल विजेता के साथ-साथ अपने समय का कुशल एवं उच्चकोटि का भवन निर्माता भी था। उसने राज्य सिंहासन संभालते ही प्रथम वर्ष में प्राकृतिक प्रकोपों से नष्ट हुई प्राचीरों द्वारों, भवनों की मरम्मत करायी ।। खारवेल ने जनता की सुख-सुविधाओं का ध्यान रख पैंतीस लाख रुपये खर्च कर शीतल जलाशयों का पुनर्निर्माण कराया । कृषकों की भलाई एवं उत्पादन में वृद्धि के लिए सिंचाई की।
आरश्यकता को ध्यान में रखते हुए पूर्व नन्द राजा द्वारा निर्मित तनसुलि नहर को राजधानी तक आगे बढ़ाया । इस नहर की लम्बाई में वृद्धि कर उसने बहुत से असहाय कृषकों को प्रसन्न किया । प्राची नदी के तट पर निर्मित्त विजय प्रासाद उसके स्थापत्य प्रेम का प्रतीक है।
अपने शासनकाल के 13वें वर्ष में खारवेल ने उदयगिरि पर्वत पर भव्य एवं आकर्षक देवालय का निर्माण कराया । देवालय के समीप ही एक विशाल भवन है। इस देवालय में सुन्दर मणि जड़ित मण्डप का निर्माण कराया जो चार स्तम्भों पर टिका हुआ है।
| खारवेल का धर्म कलिंग सम्राट खारवेल संकीर्ण प्रवृत्ति का व्यक्ति नहीं था। वह सभी धर्मों का व सभी धर्म- तीर्थों का समान आदर करता था उसकी दृष्टि में कोई धर्म ऊंचा या नीचा नहीं था । उसने अपने शासनकाल में ब्राह्मणों को पुष्कल दान दिया था। जिसमें सोने का कल्पवृक्ष, हाथी, घोड़े, रथ तथा सारथी भी सम्मिलित थे । खारवेल के अभिलेख में राजर्षि कहा गया है।
जहाँ तक खारवेल के व्यक्तिगत प्रश्न है कि वह किस धर्म की दीक्षा लिये हुए था। इसके विषय में इतिहासकारों की मान्यता है कि वह व्यकितगत रुप से जैन था। उसने हाथी गुम्फ अभिलेख जैन रीति-रिवाजों के अनुसार नमो अरहतानं नमो सब सिधानं से आरम्भ किया है। खारवेल ने जैन धर्म के आस्थकों के लिए उदयगिरि पर अर्हतों के लिए सुसज्जित गुफाओं का निर्माण कराया । मगध से जिनकी मूर्ति लाकर प्रस्थापित कराई गई। उदयगिरि पर्वत पर इस सुन्दर देवालय के समीप ही खारवेल ने जैन आस्थकों के लिए एक विशाल सभा भवन का निर्माण कराया। अपने शासन काल के 11वें वर्ष में उसने केतुभद्र की प्रतिमा का वृहद् जुलूस निकाला। इस जुलूस से प्रजा में प्रसन्नता की लहर आ गई। सम्राट खारवेल के कार्यकाल में जैन धर्म का कलिंग में काफी प्रसार हुआ।
खारवेल का विद्या प्रेम–खारवेल के चरित्र को सूक्ष्मता की दृष्टि से परखें तो स्पष्ट होता है कि वह एक विद्या प्रेमी था। वह विद्वानों का आदर करता था वह स्वयं भी विद्वान् था एवं अनेक विषयों गणित, अर्थशास्त्र व विधि आदि का अच्छा ज्ञाता था। वह संगीत की विद्या में पूर्णता प्राप्त किये हुए था।
खारवेल अपने युग का पराक्रमी सम्राट था । उसका विवाह वाजीरघर की राजकुमारी से हुआ था । हाथी गुम्फ अभिलेख में उसके शासनकाल के 13वें वर्ष के पश्चात् का कोई वर्णन नहीं है। इस अभिलेख से प्राप्त जानकारी के आधार पर ही विभिन्न इतिहासकारों का यह अनुमान है कि इसके पश्चात् खारवेल की मृत्यु हो गई।
खारवेल का तिथिक्रम यद्यपि खारवेल के शासनकाल का हाथी गुम्फ अभिलेख में प्रतिवर्ष उल्लेख है, परन्तु अभी भी उसका तिथिक्रम विवाद का विषय बना हुआ है। खारवेल के तिथिक्रम के सम्बन्ध में दो मत पठनीय है इनमें एक मत के अनुसार खारवेल द्वितीय शताब्दी ई. पू. के मध्य में हुआ था । जबकि दूसरा मत पहली शताब्दी ई. पू. के उत्तरार्द्ध में खारवेल के तिथिक्रम को मानता है । प्रथम मत के पक्ष के प्रतिपादक डॉ. जायसवाल व स्मिथ आदि इतिहासकार हैं। डॉ. भगवान लाल इन्द्र के विचार को आधार बनाते हुए डॉ. जायसवाल ने यह तर्क दिया था कि हाथी गुम्फ अभिलेख की 16-17वीं पंक्ति में उल्लेख है कि खारवेल का अभिलेख मौर्यकाल के 164 वर्ष बाद उत्कीर्ण हुआ। डॉ. जायसवाल मौर्यकाल अशोक के शासनकाल के आठवें वर्ष से मानते हैं। इस गणना से हाथी गुम्फ अभिलेख का निर्माण 90 ई. पू. में तथा खारवेल का जन्म 127 ई.पू. में बैठता है। परन्तु इस मत को भी अनेक विद्वानों का समर्थन नहीं मिला डॉ. घोष ने इस गणना को सन्देहास्पद बताया । और कहा कि हाथी गुम्फ अभिलेख पर लिखित सूचना के आधार पर मौर्य काल का कहीं भी उल्लेख नहीं है। डॉ. जायसवाल का कथन था कि वृहस्पति ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पुष्य नक्षत्र का स्वामी है इस तर्क पर भी मतभेद रहा और इसे विभिन्न इतिहासकारों ने मानने से इन्कार कर दिया।
डॉ. जायसवाल ने अपने तर्क के समर्थन में प्रभास अभिलेख में वर्णित वृहस्पति मित्र का एवं कौशाम्बी में मिली एक मुद्रा का उल्लेख किया है। जिस पर वृहस्पति मित्र अंकित है। डॉ. घोष ने इस तर्क का भी खण्डन करते हुए कहा कि वृहस्पति मित्र एवं पुष्यमित्र एक ही व्यक्ति नहीं हो सकते । तर्क से सम्बन्धित बृहस्पति मित्र अयोध्या और बरेली (अहिच्छत्र) प्रदेश का कोई स्थानीय शासक था जहाँ इस नाम के बहुत से सिक्के मिले हैं। डॉ. स्मिथ इन मुद्राओं को पहली शताब्दी ई. पू. और पहली शताब्दी ई. सन् के मध्य माना है।
| द्वितीय पक्ष के समर्थन में कुछ ठोस प्रमाण प्राप्त हैं जिन्हें डॉ. दिनेश चन्द्र सरकार व चन्दा एवं डॉ. राय चौधरी ने अपने प्रयासों से जुटाये हैं। इन इतिहासकारों ने खारवेल के तिथिक्रम को पहली शताब्दी ई. पू. के उत्तरार्द्ध में माना है। इनके तर्क निम्न हैं।
(i) डॉ. सरकार व चन्दा- ने लिखाई को आधार मानकर हाथी गुम्फ अभिलेख के
निर्माण का समय पहली शाताब्दी का अन्तिम चरण माना है, इन इतिहासकारों के विचारानुसार नानाघाट अभिलेख का निर्माण भी जिसको शतकर्णी प्रथम व उसकी पत्नी नयनिका ने निर्मित कराया था। यह अभिलेख प्रथम शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध का है। अतः शतकर्णी प्रथम व खारवेल का एक ही समय के थे।
(ii) डा. चौधरी के मतानुसार- प्रथम सातवाहन सम्राट सिमुक अन्तिम कण्वी राजा
सुशर्मा का समकालीन था। 27 ई. पू. के कण्वों के उन्मूलन के पश्चात् उसने सम्राट का पद प्राप्त किया। डॉ. चौधरी दी गई इस गणना में पौराणिक तिथि क्रम से भी
मेल बैठता है। (iii) डॉ. चन्दा- ने बेसनगर के गरुड़ध्वज एवं नानाधाट के खेल का गहनता से अध्ययन
कर यह मत दिया कि नानाघाट अभिलेख गरुड़ध्वज के पश्चात् का है। डॉ. चन्दा
के इस मत से भी शतकर्णि और खारवेल के समकालीन होने की पुष्टि होती है। (iv) हाथी गुम्फ अभिलेख से यह सिद्ध होता है कि “खारवेल तनसुल झील को राजधानी
तक लाया जिसको 300 वर्ष पूर्व प्रथम नन्दराजा ने निर्मित्त कराया था। डॉ. जायसवाल ने नन्दराजा नंदिवर्द्धन का जिक्र किया है। परन्तु डॉ. घोष का कथन है। कि यह नन्द राज्य महापद्मनन्द था-नदिबर्द्धन नहीं । इस प्रकार खारवेल के शासन काल से 300 वर्ष पहले का सम्राट महापद्मनन्द था । चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्याभिषेक की तिथि 322 ई. पू. थी। खारवेल के तिथि क्रम में डॉ. घोष ने अपनी गणना के आधार पर जिस तरह निर्धारित किया है। उससे खारवेल का जन्म 43 ई. पू. इसकी राज्याभिषेक तिथि 24 + 5वाँ वर्ष + 14, राज्याभिषेक 19 ई.पू. एवं हाथी गुम्फ अभिलेख का निर्माण 5 ई. पू. डॉ. घोष द्वारा दी गई इस गणना से शतकर्णि प्रथम के साथ खारवेल के युद्ध की तिथि 17 ई. पू. का हाथी गुम्फ अभिलेख तथा पौराणिक तिथि क्रम दोनों से ही मिलान हो जाता है।

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