The Guptas period was the golden age of Art and Literature. Bring out the truth of this statement.
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गुप्त काल में ही मातृगुप्त एवं मातृभेट नामक कवि हुए थे, दुर्भाग्य से जिनकी रचनाएं आज उपलब्ध नहीं हो पाई हैं।
यह कहा जाता है कि मातृभेंट ने हयग्रीव वध नामक काव्य की रचना की जिसकी बहुत अधिक प्रशंसा मातृगुप्त ने भी की है। इसी काल में कुमार दास ने जानकी हरण नामक ग्रंथ की रचना की । उनके काव्य का अनुवाद सिंहली भाषा में अब भी मिलता है। माघ ने महाभारत से कथावस्तु लेकर शिशुपाल वध नामक काव्य की रचना की। उनके काव्य में व्याकरण के नियमों के बहुत दृष्टांत मिलते हैं। इस काव्य में छन्दों का भी प्रयोग मिलता है।
गुप्तकालीन साहित्य
(iii) गद्य एवं गल्प - संस्कृत गद्य की रचना क्षेत्र में सुबन्धु का नाम अग्रगण्य है। वस्तुत: उसी की रचनाओं ने संस्कृत गद्य का अविर्भाव किया। उसने ही सर्वप्रथम संस्कृत में रोमांचक गद्य साहित्य को शुद्ध किया । इनकी एक मात्र कृति वासवदत्ता है जो अपने ढंग की पहली पुस्तक है । गुप्तकाल में नैतिक शिक्षा देने के उद्देश्य से छोटी-छोटी कहानियाँ लिखी गई जो गल्प साहित्य में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। विष्णु शर्मा नामक पंडित ने पंचतंत्र की रचना की। इस पुस्तक को इतनी ख्याति मिली है कि विश्व की पचास से भी अधिक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। यद्यपि यह कृति आज मूल रूप में प्राप्त नहीं है। तथापि वृहतकथा मंजरी, कथा सरित्सागर, नैपाली पंचतंत्र तथा हितोपदेश के रूप में संस्करणों में आज भी उपलब्ध है। इसी काल का गल्प साहित्य का दूसरा ग्रंथ गुणाण्य की वृहत कथा है। यह पैशाची पद्य में लिखी हुई थी।
(iv) कोष तथा व्याकरण - गुप्तकाल में एक कोष की रचना भी हुई। संस्कृत के प्रसिद्ध अमरकोष की रचना कोषकार अमरसिंह ने की । वह सम्भवतः चन्द्रगुप्त द्वितीय की राज्यसभा के नौ रत्नों में से एक था, चाहे संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य इस युग में हुआ लेकिन संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह युग पीछे ही रह गया । इसका मुख्य कारण सम्भवतः यह है कि पाणिनी कात्यायन और पातन्जलि के ग्रंथ अत्यधिक लोकप्रिय थे । इसका कारण किसी नवीन व्याकरण ग्रंथ के लिए सहज ही प्रसिद्धि प्राप्त करना बहुत ही दुष्कर था। फिर भी चन्द्रगोमी नामक बंगाली बौद्ध भिक्षु ने चन्द्र व्याकरण ग्रंथ लिखा जो बहुत लोकप्रिय हुआ और महायान बौद्धों द्वारा अपनाया गया।
(v) राजनीति - इस क्षेत्र में कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर कामन्दकीय नीतिसार नामक ग्रंथ की रचना की। कुछ विद्वानों के मतानुसार इसका रचियता चन्द्रगुप्त के मंत्री शिखर स्वामी था। कुछ लोग इसे कामन्दक नामक विद्वान की रचना मानते हैं। कहा जाता है कि उसने कौटिल्य को अपना गुरु माना था। इस कारण यह ग्रंथ अर्थशास्त्र का ही संक्षिप्त रूप है, परन्तु राजनीति के विभिन्न अंगों के वर्णन में मौलिकता भी स्पष्ट दिखाई पड़ती है। इस ग्रंथ का विषय शुद्ध राजनीति है। ।
(vi) कामसूत्र - इस काल में कामशास्त्र पर वात्सायन ने ग्रंथ (कामसूत्र) लिखा । इसमें काम जीवन के समस्त पक्षों जैसे सामाजिक, वैयक्तिक, शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, भोग इत्यादि का वैज्ञानिक ढंग से विवेचन किया है परन्तु इसमें अश्लीलता नहीं है। इसकी रचना मनुष्यों के लिए तथा मंगल कामना से प्रेरित होकर ही की थी।
गुप्तकालीन धार्मिक साहित्य -
(A) रामायण, महाभारत तथा गीता - गुप्तकाल में धार्मिक साहित्य की रचना हुई। इस काल की अधिकतर कृतियों में धार्मिक पूर्वाग्रह मिलता है। दो महाकाव्य रामायण और महाभारत अन्तिम तौर पर सम्भवत: चौथी शताब्दी ई. में संकलित किये गये। रामायण राम-रावण के संघर्ष की विस्तृत कहानी प्रस्तुत करती है। इसके दो महत्त्वपूर्ण नैतिक आधार हैं। प्रथम यह परिवार रूपी संस्था को आदर्श रूप में प्रस्तुत करती है जिसमें पुत्र पिता के प्रति तथा अनुज ज्येष्ठ भ्राता का पालन करने वाला तथा पत्नी सभी परिस्थितियों में पति के प्रति निष्ठावान रहे जैसे सामाजिक आदर्शों को प्रस्तुत किया गया है। द्वितीय रावण अधर्म का तथा राम धर्म का प्रतीक है। अन्त में सदाचार कुरीति पर और अच्छी व्यवस्था बुरी व्यवस्था पर विजय प्राप्त कर लेती है। महाभारत में कौरवों तथा पाण्डवों का संघर्ष है। यह महाकाव्य भी बुराई की शक्तियों पर सदाचार की विजय दिखलाता है। भगवत् गीता महाभारत का महत्त्वपूर्ण भाग है। यह ग्रंथ शिक्षा देता है कि हर व्यक्ति को फल की इच्छा किये बिना सभी परिस्थितियों में अपनी जाति तथा सामाजिक श्रेणी द्वारा निर्धारित कर्तव्य का पालन अवश्य करना चाहिए।
| (B) पुराण - पुराणों का जो रूप अब प्राप्त होता है उसकी रचना इसी काल में हुई। पुराणों में ऐतिहासिक परम्पराओं का वर्णन है जिनका विषय सृष्टि के आरम्भ से है और जिनमें प्रत्येक राजवंश की विस्तृत वंशावलियाँ दी गई हैं। वे विशिखाओं, आरकानों, प्रवचनों इत्यादि से भरपूर हैं। उनका उद्देश्य सर्व साधारण को शिक्षा देना तथा उनकी नैतिक उन्नति करना था। ब्राह्मणों के हाथ में आ जाने पर पुराणों की पुनर्रचना पांडित्य पूर्ण संस्कृत में की गई। उसमें विभिन्न हिन्दूमतों, आचार तथा प्रथाओं के ज्ञान को सम्मिलित किया गया जिससे वे हिन्दुओं के प्रमाणिक धर्मग्रन्थ बन गये।
(C) स्मृतियों का संकलन तथा भाष्य आदि लिखना -
हिन्दू धर्म के साहित्य को लोकप्रिय बनाने और उसमें नवीनता लाने की दृष्टि से ब्राह्मण धर्मशास्त्रों का संशोधन और परिवर्तन गुप्तकाल में हुआ। इस काल में विभिन्न स्मृतियों का संकलन किया गया। इस काल में नारद, कात्यायन, पाराशर, वृहस्पति, स्मृतियों की रचना हुई। स्मृतियों के ऊपर भाष्य लिखने का दौर सम्भवतः उत्तर गुप्त काल में शुरू हुआ।
(D) दर्शन - इस क्षेत्र में भी गुप्तकाल में सभी धर्मों के आचार्यों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । षड्दर्शन, सांख्य योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व एवं उत्तर मीमांसा (वेदान्त) की महत्त्वपूर्ण कृतियों की रचना इसी काल की बताई जाती है। गुप्तकाल में कुछ दर्शन शास्त्रों पर टीकायें तथा भाष्य लिखे गये।
(E) बौद्ध साहित्य - इस काल में बौद्ध दर्शन पर भी ग्रंथों की रचना हुई। दीपवंश तथा महावंश जैसे पाली ग्रंथों की रचना 350 ई. से 475 ई. के लगभग हुई। असंग नामक दार्शनिक (जो यगोचर समुदाय के संस्थापक माने जाते हैं) भी इसी काल में हुए। उन्होंने अनेक बौद्ध ग्रंथों (सम्परिग्रह, प्रकरण, आर्यवस्था, संगीति शास्त्र, योगाचार, भूमि शास्त्र इत्यादि) की रचना की । इसकी चौथी शताब्दी में बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध विद्वान बसुबन्धु हुए। त्रिपिटक के अनुसार इन्होंने 36 ग्रंथों की रचना की ।
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