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Describe the Social, Economic and Religious condition of India during the Gupta period.

Describe the Social, Economic and Religious condition of India during the Gupta period.


(ख) गुप्तकाल में सती-प्रथा - भास, कालिदास और शूद्रक के ग्रन्थों से सती-प्रथा की जानकारी अवश्य मिलती है परन्तु इसके अन्य ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं प्राप्त होते । फ्लीट महोदय ने सम्पर्ण गुप्त अभिलेखों के साक्ष्य के आधार पर केवल महाराज गोपराज की मृत्यु पर उसकी विधवा द्वारा शव के साथ सती होने का एक मात्र उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसकी तिथि 10 ई है। गुप्तकालीन स्मृतिकारों में केवल वृहस्पति ऐसे हैं जिन्होंने विधवा को सती होने की सम्भावना को बतलाया है परन्तु अन्य सभी स्मृतिकार विधवा के लिए साधु जीवन व्यतीत करने के नियमों का अनुमोदन करते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सती प्रथा जैसी कुप्रथा को गुप्तकाल में धार्मिक मान्यता नहीं प्राप्त हो सकी थी।

गुप्तकाल में स्त्री शिक्षा - 

निसन्देह सभी स्त्रियों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। केवल उच्च वर्ग की स्त्रियों को ही थोड़ी शिक्षा दी जाती थी ताकि वे बुद्धिमता पूर्ण बात चीत कर सकें। प्रायः सार्वजनिक जीवन में भाग लेना उनके लिए जरूरी नहीं समझा गया। लेकिन कुछ श्रेष्ठ महिला विंदूषियों एवं दार्शनिकों के उदाहरण भी इस काल में मिलते हैं। काव्य मीमांसा (राजशेखर) के अनुसार स्त्रियाँ कवियत्री होती थी । कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् में अनुसूया को इतिहास का ज्ञाता कहा है। भवभूति के मालती माधव नाटक में माधवी चित्र अंकित करने तथा संस्कृत समझने योग्य दर्शाई गई है। अमरकोश में शिक्षिकाओं के लिए उपाध्याया, आज्ञार्था, आध्यायीय इत्यादि शब्दों का प्रयोग हुआ है। | (घ) अल्पायु में विवाह - स्त्रियों की विवाह की आयु गुप्त युग में निम्न हो गई थी। मनुस्मृति में यद्यपि कन्या को किसी भी आयु तक पिता के घर में रहने की मान्यता दी गई थी जब तक कि योग्य वर मिल सके । परन्तु गुप्तकालीन स्मृतिकार याज्ञवल्क्य और नारद पिता को नरक का भागीदार बताते हैं। यदि वह अपनी कन्या का विवाह रजस्वला होने से पूर्व नहीं करता था। इसका प्रभाव यह हुआ कि कन्याओं के विवाह की सामान्यतः आयु 12 से 13 वर्ष ही स्वीकार की जाने लगी। नि: सन्देह अल्पायु में विवाह की प्रथा के विकास के कारण स्त्री शिक्षा को धक्का पहुंचा और बाल विवाह के कारण समुचित रूप से विद्याभ्याम का अवसर कन्याओं से छिन गया। अतः इस दृष्टि से गुप्तकाल में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में गिरावट आयी।
(इ) पर्दा-प्रथा का कम प्रचलन - ऐसा प्रतीत होता है कि इस काल में पर्दे की प्रथा का अधिक विकास नहीं हुआ। इस काल में आये चीनी यात्री फाह्यान ने अपने विवरण में स्त्री पर्दे को कहीं उल्लेख नहीं किया है। परन्तु साहित्यिक साक्ष्यों से उच्च वर्ग की स्त्रियों में परदे की प्रथा की जानकारी प्राप्त होती है । कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम में कहा है कि जब शकुन्तला राजा दुष्यन्त के दरबार में गई तो उसने अपने मुख को अवगुंठन से ढक लिया। दक्षिण प्रान्तों के यवन, शक, कुषाण तथा हूण आदि विदेशी आक्रमणों का प्रभाव न होने के कारण पर्दा प्रथा बिलकुल नहीं थी । विद्वानों की राय है कि अजन्ता तथा ऐलोरा में बनी मूर्तियों तथा चित्रों में इसीलिए कहीं भी स्त्री को पर्दे में नहीं दिखाया गया है।

(च) विधवाओं की स्थिति - 

विधवाओं के रूप में स्त्रियों की स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी । उच्च वर्ग तथा ब्राह्मण वर्ण की विधवाओं का जीवन कष्टपूर्ण था। उन्हें सफेद वस्त्र धारण करने होते थे और जीवन भर ब्राह्मण धर्म का पालन करना होता था।

(छ) गणिकाएँ तथा देवदासियाँ - 

गणिकाएँ नागरिक जीवन का सामान्य अंग थीं । उनको न तो उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था और न ही भावुकता पूर्ण दृष्टि से देखा जाता था । कामसूत्र में गणिका को दिए जाने वाले प्रशिक्षण के वर्णन से स्पष्ट है कि इस व्यवसाय की अधिक माँग थी । कालिदास ने विदिशा की गणिकाओं के साथ साहसी नवयुवकों की क्रीड़ाओं का उल्लेख किया है । विशाखदत्त ने अपने ग्रंथ मुद्राराक्षस में बड़ी संख्या में वेश्याओं के सड़कों पर आने का उल्लेख है । इसमें देवदासियों के भी कई उल्लेख मिलते हैं। वे मन्दिरों के साथ सम्बन्धित होती थी तथा नाच, गाना तथा संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत करती थीं।।

(ज) सम्पत्ति का अधिकार - 

स्त्रियों को सम्पत्ति का अधिकार प्राप्त था। इस विषय में याज्ञवल्क्य स्मृति में कुछ मान्यताओं का उल्लेख किया गया है। उन्होंने पत्नी को भी पति की सम्पत्ति का अधिकारी बतलाया है । पुत्र के अभाव में पुरुष की सम्पत्ति पर उसकी पत्नी का सर्वप्रथम अधिकार होगा और उसके बाद कन्याओं का । | विवाह प्रथा - गुप्तकाल के साहित्य तथा अभिलेखों से राजवंशों के विवाह के सम्बन्ध में अनेक उल्लेख प्राप्त होते हैं। उनसे प्रतीत होता है कि इस काल में अन्तर्जातीय विवाह होते थे। गुप्तों का विवाह सम्बन्ध ब्राह्मण वाकाटकों के यहाँ तथा क्षत्रिय लिच्छवियों और नाग वंशों के साथ हुआ था । प्राय: लड़कियों का विवाह अल्पायु में होता था तथा साधारण वर्ग के लोगों की विधवाएँ पुनर्विवाह कर सकती थी। कभी- कभी राजवंश एवं उच्च वर्गों की विधवाएँ भी पुनर्विवाह कर लेती थी । अनयेत वृद्ध - विवाह का उदाहरण कुमारगुप्त प्रथम के जीवन में मिलता है । बहुविवाह के कई एक दृष्टान्त मिलते हैं ।

गुप्तकाल में भोजन तथा खान- पान - 

भोजन के बारे में कहा जा सकता है कि इस काल में जनता ज्यादातर शाकाहारी होती जा रही थी । चीनी यात्री फाह्यान के विवरण से स्पष्ट है कि चाण्डालों के अतिरिक्त कोई मांस, मछली, लहसुन, प्याज इत्यादि नहीं खाता था लोग शराब इत्यादि मादक पदार्थों का सेवन भी नहीं करते थे। दूसरी ओर गुप्तकालीन स्मृति ग्रंथों से भी खानपान के विषय में महत्त्वपूर्ण विवरण प्राप्त होता है। वृहस्पति मांस और मदिरा के प्रयोग का निषेध केवल उन स्त्रियों के लिए करते हैं जिनके पति विदेश गए हुए हों । वे स्पष्ट रूप से रोगी तथा श्राद्ध के अवसर पर माँस खाने की आज्ञा देते हैं । दक्षिण भारत में भी समाज तथा राजदरबार में माँस का प्रयोग बहुत अधिक प्रचलित था । निसन्देह खान-पान पर अहिंसा मार्गी वैष्णव, जैन तथा बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ रहा था। | 

गुप्तकाल में वस्त्र-आभूषण और श्रृंगार - 

इस काल की प्रतिमाओं को देखकर और साहित्यिक स्त्रोतों का अध्ययन करके यह कहा जा सकता है कि वस्त्र- आभूषण और श्रृंगार में इस युग के लोगों ने ऊँचे स्तर पर सौन्दर्य की सृष्टि की थी। स्त्री-पुरुष, गरीब-अमीर सभी लोग प्रायः अच्छ वस्त्र यथाशक्ति आभूपण तथा यथा योग्य श्रृंगार करते थे । 

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