Describe Development of Literature, Art and Science during Gupta age.
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(3) नचना कुठार का पार्वती मन्दिर - अजयगढ़ में स्थित यह मन्दिर चबूतरे पर बनाया गया है । चबूतरा 35 फीट का चौकोर है। साढे आठ फीट की चौड़ाई का मन्दिर में गर्भगृह है और इसी गर्भगृह के सामने एक मण्डप है। गर्भगृह के चारों ओर एक प्रदक्षिणा पथ भी बना है। गर्भगृह की दीवारों पर विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ अंकित हैं।
(4) देवगढ़ का दशावतार का मन्दिर - दशावतार का मन्दिर उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में देवगढ़ नामक स्थान पर स्थित है। यह मन्दिर एक ऊँचे चबूतरे पर निर्मित है। इस मन्दिर के चबूतरे पर चढ़ने के लिए चारों ओर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। मन्दिर के द्वार पर गंगा और यमुना की मूर्तियाँ हैं । इस मन्दिर में शिखर का निर्माण कराया गया जो वर्तमान में काफी नष्ट हो गया है । इसके गर्भ गृह के चारों ओर बने हुए चार मण्डप हैं। मन्दिर में एक स्थान पर गजेन्द्र मोक्ष तथा दूसरे स्थान पर शेषनाग पर शयन करते हुए भगवान विष्णु का चित्र अंकित किया गया है। इसमें भगवान राम तथा भगवान कृष्ण के जीवन से सम्बन्धित तथा उनकी लीलाओं के दृश्य अंकित मिलते हैं। अधिकांश विद्वान इस मन्दिर की निर्माण कला को अति सुन्दर मानते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार ब्राउन का कथन है कि कुछ ही इमारतों में शल्प की इतनी सुन्दर तथा परिपक्व कारीगरी देखने को मिलती है जैसा कि गुप्त यग के देवगढ़ के दशावतार मन्दिर में देख, को मिलती है।
गुप्तकाल के मन्दिरों की विशेषतायें
इन मन्दिरों के अतिरिक्त गुप्तकाल के ईंटों के बने मन्दिर कानपुर के भीतरी गाँव बंगाल के पहाड़पुर तथा मध्यप्रदेश में सीरपुर में हैं।
(5) भीतरी गाँव का मन्दिर - यह मन्दिर उत्तरप्रदेश के कानपुर जिले में भीतरी गाँव में स्थित है। इसका निर्माण ईंटों से किया गया है । इस मन्दिर की छत शृंडाकार (Pyramidal) है। इसकी दीवारों की टैराशेटी की पट्टियों में हिन्दू पौराणिक कथायें प्रस्तुत की गई हैं।
(6) खोह का शिव मन्दिर - यह मन्दिर भूतपूर्व नागोद राज्य में स्थित है। इसमें शिव की मूर्ति स्थापित की गई थी।
(7) साँची का बौद्ध मन्दिर ।
(8) लखान और कोगगुडी के मन्दिर
(9) महाबोधि मन्दिर
मन्दिरों के अतिरिक्त गुप्तकाल में कई राजमहल भी बनाये गये । हालांकि उनके बारे में हमें साक्ष्य केवल साहित्यिक वर्णन ही देते हैं। मानसार नामक शिल्प शास्त्र में राजमहल का अत्यन्त सुन्दर विवरण मिलता है। तत्कालीन राजमहल में अभिव्यक्त वास्तुकला का अनुमान अमरावती, नागार्जुन, कोड़ा और अजन्ता के भित्ति चित्रों से भी लगाया जा सकता है। जिनमें राजकीय महल आदि दिखाये गये हैं। यह महल दण्डाकार गर स्तम्भों पर बनाये जाते हैं। उनकी छतों से बड़े-बड़े मोतियों के गुच्छे लटकते थे। चन्दोवे के नीचे सिंहासन (Roya Seat) बनी होती थी। बाण भट्ट ने कादम्बरी में शूद्रक के महल का इसी प्रकार का वर्णन किया है। गुप्तकाल में कुछ स्तम्भ भी बनाये गये जिनमें विजय यात्राओं के विवरण उत्कीर्ण हैं। गुप्त कालीन स्तम्भों में अनेक कोण होते हैं। इन पर किसी भी प्रकार का चिकनापन और पालिश नहीं पाई गई है। वास्तुकला की दृष्टि से गुप्तकालीन स्तम्भों की बनावट का अध्ययन चार भागों में किया जा सकता है।
(1) स्तम्भ का मुख्य भाग - स्तम्भ का मुख्य भाग प्रायः चौकोना होता था जो ऊपर की ओर आठ या सोलह केन्द्रों में विभाजित हो जाता था।
(2) गल कुम्भ (Base of Capital) - गलकुम्भ स्तम्भ का वह भाग होता था जो स्तम्भ के ऊपरी भाग पर रखा जाता था। यह प्रायः पत्थर का बना अधोमुखी कमल के आकार का होता था।
(3) बौधिक (Crown) फलका के ऊपर प्रायः किसी प्रकार की मूर्ति रखी जाती थी, जिसे बौधिक कहते हैं। बुद्ध गुप्त के ऐरण स्तम्भ में सिंह पीठ लगाये बैठे हैं जिनके आसन पर गरुड़ की मूर्ति रखी है।
(4) फलका (Abacus) - फलका स्तम्भ के सिरे के मध्य भाग को कहते हैं यह चौकोर
पत्थर का बना होता था।
गुप्तकालीन मूर्तिकला की प्रमुख विशेषताएँ-
गुप्तकाल में मूर्तिकला की बहुत उन्नति हुई । इस युग में हिन्दुओं के देवी देवताओं की ही नहीं अपित भगवान बुद्ध तथा महावीर स्वामी की भी अनेक मूर्तियों का निर्माण किया जाने लगा। डॉ. वी. एस. अग्रवाल का कथन है कि “गुप्तकाल में कुशल कलाकारों की तक्षणी ने पत्थर को स्थाई और लालित्य प्रदान किया गुप्त मूर्तिकला की सफलता कुषाण मूर्तियों की कामुकता और प्रारम्भिक मध्ययुगीन कला की प्रतीकात्मक कल्पना के सन्तुलित सम्मिश्रण में है। इस युग में नग्नतापूर्ण लुप्त हो गई । शारीरिक आकर्षण को छिपाने के लिए वस्त्र का प्रयोग किया गया ।” डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार का कथन है कि गुप्ता से हम भारतीय शिल्प के कलात्मक युग में प्रवेश करते हैं। शताब्दियों के अथक प्रयास से कला की तकनीक में पूर्णता लाई गई और कला के निश्चित रूपों को विकसित किया गया । अब शिल्प की दुनिया में नई आशा उत्पन्न हुई। गुप्त शिल्प कालान्तर में सभी युग की कला के लिए ही मार्गदर्शक नहीं रहा बल्कि वह सुदुरपूर्व के भारतीय उपनिवेश की कला के लिए भी मार्गदर्शक बना रहा।” इस तरह मूर्तिकला की दृष्टि से गुप्तकाल में पर्याप्त निर्माण कार्य हुआ । गुप्तकालीन मूर्तिकला ने नवीन पद्धति को जन्म दिया।
(1) भरहुत और सांची की मूर्तिकला में प्रकृति, वनस्पति जगत और पशु आकृतियों का चित्रण प्रधान रूप में होने लगा जिससे मानव आकृति का महत्त्व लुप्त होता सा जान पड़ता है । इस काल की मूर्तिकला में स्वाभाविकता, अंग सौन्दर्य, आकार- प्रकार तथा सजीवता आदि गुण दृष्टिगोचर होते हैं।
| (2) गुप्तकाल तक मथुरा और गाँधार मूर्ति शैली पर जो विदेशी प्रभाव था वह समाप्त हो गया था। गुप्त मूर्तियाँ शुद्ध भारतीय शैली में बनने लगी थी । जहाँ प्रकृति मानव भावनाओं को प्रदर्शित करने वाली थी वहाँ अब मानव आकृति-प्रकृति के उस सजीव और अनन्त सौन्दर्य को मुखरित करने वाली बन गई । गुप्त कालीन मूर्तिकारों ने इस भावना को प्रस्तुत करने के लिए युवा आकृतियों का भी निर्माण किया । मानव आकृतियों का निर्माण अपने स्वाभाविक रूप में बड़ी सावधानी से किया गया है उन्हें देखकर यह लगता है कि गुप्त संगतराशों के हाथों में पत्थर मोम बन गया है।
(3) इस काल में मूर्तियाँ केवल हिन्दू तथा बौद्ध देवताओं की ही नहीं अपितु जनसाधारण की भी बनाई गई ।
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