गुप्तों के शासनकाल की भारत की सांस्कृतिक उपलब्धियों पर निबंध लिखिए।
गुप्तों के शासनकाल की भारत की सांस्कृतिक उपलब्धियों पर निबंध लिखिए।
(4) इस काल की मूर्ति कला के तीन प्रमुख केन्द्र थे - मथुरा, सारनाथ एवं पाटलिपुत्र । यहाँ पर बनी मूर्तियाँ लाल, काले और भूरे पत्थरों की होती थी। मथुरा से प्राप्त मूर्तियों की कला की दृष्टि से प्रमुख विशेषतायें निम्न थी(1) इन मूर्तियों में प्रभामण्डल सजाया जाता था। प्राय: इसे सजाने के लिए कमल का
प्रयोग किया जाता था।
(2) इन मूर्तियों में कुषाण काल की मूर्तियों की तरह वस्त्रों में व्यावर्तन (Folds in Drapery) दिखाया गया है।
(3) इन मूर्तियों में संवारे हुए बाल भी दिखाये गये हैं।
(4) मथुरा में 5वीं शती तक मूर्तियाँ बनती रही।
सारनाथ में ब्राह्मण तथा बौद्ध धर्म से सम्बन्धित अनेक मूर्तियाँ बनी। इस काल की बुद्ध प्रतिमाओं में चक्रावृत्ति (धर्म-चक्र) प्रमुख रूप से दिखलाया गया है। यहाँ से प्राप्त बुद्ध की मूर्तिकला की दृष्टि से बहुत ही अलग मानी जाती है। पाटलिपुत्र में अधिकतर धातु की मूर्तियाँ बनायी गई। ये मूर्तियाँ देखने में पत्थर की मूर्तियों के समान हैं और वस्त्र परिधान तथा केश राशि की बनावट बिल्कुल सारनाथ की मूर्तियों जैसी ही हैं।
गुप्तकाल में पत्थर तथा धातु के अतिरिक्त मिट्टी और मसाले की मूर्तियों को भी fण हुआ। इन प्रतिमाओं का निर्माण नक्कासीदार ईंटों से होता था। ईंटों पर तरह-तरह भक्कासियों को बनाने के बाद उन्हें पका लिया जाता था।
गुप्तकालीन मूर्तियाँ -
गुप्तकाल में निर्मित मूर्तियों को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है।(1) बौद्ध मूर्तियां (2) पौराणिक मूर्तियाँ (3) जैन मूर्तियाँ (4) अन्य मूर्तियाँ
(1) बौद्ध मूर्तियाँ -
(i) सारनाथ की बुद्ध मूर्ति - सारनाथ में धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में वड़ की जो प्रतिमा मिली है वह अपने लावण्य, गाम्भीर्य और भव्य अभिव्यक्ति की दृष्टि से तत्कालीन मूर्तिकला का सबसे भव्य नमूना माना जाता है। इस युग की बुद्ध की मूर्तियों के बाल घंघराले हैं उनके प्रभामण्डल अलंकृत हैं तथा मुद्राओं में विविधता है। इस मूर्ति में बुद्ध के मुख पर आध्यात्मिक शान्ति की आभा दिखाई देती है। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल का कथन है कि “उपदेशात्मक मुद्रा में बुद्धजी की मूर्ति की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति, शान्त मुस्कान तथा गम्भीर ध्यान मुद्रा भारतीय कला की उच्चतम सफलता का साक्ष्य प्रस्तुत करती है।”(ii) सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति - भागलपुर के समीप सुल्तान गंज में बुद्ध की सात फीट उंची पीतल की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इसमें महात्मा बुद्ध खड़े दर्शाये गये हैं और उनके हाथ अभय मुद्रा में हैं, उनके केश धुंघराले और मुख मण्डल पर करुणा और दिव्यता के दर्शन होते हैं।
(iii) मथुरा की बुद्धमूर्ति - मथुरा से मिली मूर्ति में भी महात्माबुद्ध खड़े हुए दिखाये गये हैं इस मूर्ति के वस्त्र पारदर्शक हैं और शरीर का अंग प्रत्यंग दिखाई देता है। उनके हाथ अभय मुद्रा में दिखाई देते हैं और प्रभामण्डल अलंकृत है। इस मूर्ति में उनके बाल सुंघराले प्रदर्शित किये गये हैं। इसकी ऊंचाई सात फीट ढाई इंच है। महात्मा बुद्ध के मुख पर शान्ति, करुणा और आध्यात्मिकता के दर्शन होते हैं।
इन मूर्तियों के अतिरिक्त विवरण मिलता है कि चीनी यात्री फाह्यान ने बुद्ध की ताँबे की बनी 80 फीट ऊँची मूर्ति देखी थी । परन्तु उसका अब कोई पता ठिकाना नहीं है।
(2) पौराणिक मूर्तियाँ -
इस काल में अनेक हिन्दू देवताओं की मूर्तियाँ भी बनी हैं। गुप्तकाल में मानव आकृति में जिस तरह भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ बनाई गई उसी तरह हिन्दू देवताओं की भी प्रतिमाएं बनाई गई, चूंकि अधिकांश सम्राट वैष्णव धर्मानुयायी थे इसलिए वैष्णव मूर्तियों का निर्माण स्वाभाविक था । हिन्दू देवताओं को मानव आकार दिया गया हालांकि उनकी अनेक भुजायें बनाई जा सकती थी। जिनमें उस देवता के गुण से सम्बन्धित प्रतकि बना दिये जाते थे। इन पौराणिक मर्तियों में निम्नलिखित थी(i) मथुरा की विष्णु मूर्ति - मथुरा मे मुख्यत: विष्णु के अवतारों की प्रतिमाएं बनाई ३। भगवान विष्णु की एक प्रतिमा के सिर पर मुकुट और उनके कानों में अलंकृत आभूषण खाये गये हैं। इस प्रतिमा में भगवान विष्ण के मख से शान्ति तथा आभा टपकती है। रनाथ का बुद्ध प्रतिमा के समान इस मूर्ति में भी स्वाभाविकता व भावुकता स्पष्ट झलकती ७. वासुदेव शरण अग्रवाल का कथन है, “सम्भवत: गुप्तकालीन मूर्तिकला का सर्वोत्तम उदाहरण मथुरा से प्राप्त विष्णु की प्रतिमा है। उनके मुख मण्डल पर एक स्वर्गिक आ तथा सारनाथ संग्रहालय में रखी हुई बुद्ध प्रतिमा के समान ही वह गम्भीर आध्यात्मिक की मुद्रा में है।”
(ii) देवगढ़ की विष्णु मूर्ति - विष्णु की प्रसिद्ध प्रतिमा देवगढ़ के देशावतार । में है। इस अनन्तशायी मूर्ति में विष्णु को शेषनाग की शैया पर दर्शाया गया है। वे मत कुण्डल, माला, हार व हाथों में कंगण इत्यादि से सुशोभित हैं। इस मूर्ति में विष्णु की ना से कमल निकल रहा है जिस पर ब्रह्मा विराजमान हैं। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल का कथ है “गजेन्द्रमोक्ष अनन्त पर लेटा हुआ विष्णु और हिमालय में नर तथा नारायण जिन्हें देवा मन्दिर में चित्रित किया गया है हिन्दू मूर्तिकला की सबसे श्रेष्ठ कृतियों में से हैं।”
| (iii) पहाड़पुर की राधा कृष्ण की मूर्ति - इस काल से सम्बन्धित पहाड़पुर जिले में (उत्तरी बंगाल) पाये गये मन्दिरों की दीवारों पर बनी कुछ ऐसी मूर्तियाँ हैं जिनका सम्बंध रामायण व महाभारत की कथाओं से है । पहाड़पुर की राधाकृष्ण की मूर्ति बहुत भव्य है।
(iv) काशी की कार्तिकेय की मूर्ति - कार्तिकेय की एक मूर्ति काशी के भारत कला भवन में आज भी सुरक्षित है। यह मूर्ति बड़ी सुन्दर एवं आकर्षक है। इस प्रतिमा में कार्तिकेय मोर पर बैठे हुए हैं। मोर कार्तिकेय का वाहन है। इस मूर्ति में सिर के ऊपर मुकुट, कानों में कुण्डल, गले में हार और अन्य आभूषणों से सुसज्जित सजीवता दिखाई देती है।
(v) शिव की मूर्तियाँ - गुप्तकाल में भगवान शिव की अनेक मूर्तियाँ बनाई गई। जो बड़ी सजीव और सुन्दर हैं। करमदण्डा नामक स्थान से शिव की चतुर्मुखी मूर्ति प्राप्त हुई है। गुप्तकालीन अनेक एकमुखी और चतुर्मुखी शिवलिंग नागोरद राज्य के खोह नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। इस लिंग के ऊपरी भाग पर भगवान शिव की मूर्ति बनी है। इसके शीर्ष पर विशाल रत्नजटित मुकुट शोभा दे रहा है । शीर्श पर कलात्मक ढंग से जटाओं का जूड़ा बना है। उस पर अर्धचन्द्र बड़ी कुशलता से दिखाया गया है, गले में हार और कानों में कुण्डल के अतिरिक्त कोई आभूषण नहीं दिखाया गया है।
Also Check:
Label List
- 1st Grade (16)
- 2nd Grade (16)
- 3rd Grade (3)
- Art And Bulding (1)
- B (2)
- b.ed (14)
- Ctet (13)
- ed (1)
- Gujarat lock down (1)
- Hand Notes (13)
- History (16)
- home Learning (1)
- Indian History (16)
- job (1)
- learn mathod (1)
- literature (1)
- Mains (13)
- mobile (1)
- Notes (16)
- Post History (13)
- PTET (16)
- RAS (16)
- RPSC (16)
- Teachers (13)
