गुप्तकाल में साहित्य, कला तथा विज्ञान की प्रगति का वर्णन कीजिए।
गुप्तकाल में साहित्य, कला तथा विज्ञान की प्रगति का वर्णन कीजिए।
परवर्ती गुप्तकाल में नालन्दा विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं कुलपति धर्मपाल महान् बौद्ध विद्वान माने जाते थे। इन्होंने भी अनेक बौद्ध ग्रंथों की रचना की । नागार्जुन मनोरथ तथा आचार्य बुद्धघोष भी गुप्तकालीन महान् बौद्ध दार्शनिक एवं विद्वान थे । बुद्धघोष ने त्रिपिटकों पर अनेक भाष्य लिखे हैं। विसुद्धिमग उसका प्रसिद्ध ग्रंथ हैं।
गुप्तकाल में जैन साहित्य -
गुप्तकाल में ब्राह्मण तथा बौद्ध धर्म से सम्बन्धित साहित्य के साथ-साथ जैन धर्म से सम्बन्धित साहित्य भी लिखा गया। अनेक जैन दार्शनिक ग्रंथों की रचना इसी काल में हुई । इस युग में आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने न्याय दर्शन पर ग्रंथ लिखे । न्यायावतार उनका सर्वाधिक विख्यात ग्रंथ है। इन्होंने 32 ग्रंथों की रचना की जिनमें से 21 आज भी उपलब्ध हैं। श्वेताम्बर सम्प्रदाय में सिंहसेन गण नामक आचार्य हुए। उन्होंने मास्वाति के प्रसिद्ध मंथ तत्वार्थाधिगम सूत्र पर एक प्रमाणिक टीका लिखी ।।| इस प्रकार गुप्त काल में साहित्य का बहुमुखी विकास हुआ। काव्य, नाटक, कथा, साहित्य, धर्म, दर्शन आदि सभी क्षेत्रों में उच्चकोटि की रचना की गई। इस काल को अनेक अस्मिान व्यक्तियों ने विभूषित किया जिनके उपादान से भारतीय साहित्य की विभिन्न शाखायें अत्यन्त सम्पन्न हो गई।
2) गुप्तकालीन कला -
अधिकांश विद्वान इस तथ्य को अंगीकार करते हैं कि अपने सौन्दर्य और भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से भारतीय कला गुप्त काल में अपनी पराकाष्ठा तक पहुंच गई। कला के सुन्दरतम नमूने इसी युग के प्राप्त होते हैं। इस समय कला के जो आदर्श स्थापित हुए, उसने न केवल भारत को प्रभावित किया अपितु भारत के पड़ौसी देश भी प्रभावित हुए। डॉ. वी. एस. अग्रवाल का कथन है कि “गुप्तकाल में कला की अभूतपूर्व उन्नति हुई । गुप्तकाल का गौरव और वैभव दर्शनीय कला कृतियों के द्वारा ही स्थायी और चिरस्मरणीय हो गया है। डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार का कथन है कि “सामान्यतः उच्च कोटि का आदर्श माधुर्य तथा सौन्दर्य की उच्च कोटि की विकसित भावना गुप्तकाल की विशेषता है।” डॉ रमाशंकर त्रिपाठी के अनुसार “कुल मिलाकर गुप्तकालीन कलाकारों की कृतियों की यह विशेषता है कि उनमें ओज, असंयम का अभाव तथा प्राविधिक सौष्ठव पाया जाता है।”गुप्तकालीन स्थापत्य कला -
बहुधा कहा जाता है कि पाँच शताब्दी पश्चात् मुसलमानों की मूर्ति भंजक नीति के फलस्वरूप उत्तरी भारत के मन्दिर नष्ट हो गये और यही कारण है कि अब गुप्तों की वस्तुकला के अवशेष नहीं मिलते हैं। परन्तु यह कहना सम्भवतः अधिक सही होगा कि गुप्तों के मन्दिर अप्रभावी पूजा स्थल थे, जो या तो आवसिक वास्तुकला में खो गये, या आने वाली शताब्दियों में उनका नये सिरे से निर्माण किया गया । बौद्ध अपने विहार तथा मठ बनवाते रहे और वे आज भी विद्यमान हैं। सारनाथ में थामेख स्तूप इसी काल का है जो अपनी कल्पना, आकार और अलंकार में उच्च कोटि का है। अजन्ता, एलोरा और बाघ के कतिपय गुहा विहार इसी समय खोदे गये थे, जो अपने ढंग के बहुत सुन्दर हैं। चैत्यों में एलोरा का विश्वकर्मा चैत्य, देवगढ़ (झांसी) का दशावतार मन्दिर, भाटारगाँव (कानपुर के समीप) का मन्दिर, बोध गया का महाबोधि मन्दिर इसी युग के सुन्दर देवालय और वास्तुकला के भव्य नमूने हैं तो भी निःसंकोच होकर कहा जा सकता है कि गुप्तकाल में मन्दिर निर्माण कला का जन्म हुआ उसका पूर्ण विकास नहीं ! स्मरण रहे इस मन्दिर कला का पूर्ण विकास आठवीं शताब्दी में हुआ क्योंकि तभी मन्दिरों ने महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया था। इस काल के हिन्दू मन्दिरों में तकनीकी और निर्माण सम्बन्धी अनेक विशेषतायें हैं।गुप्तकालीन मन्दिरों की विशेषतायें -
गुप्तकाल में अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ इन मन्दिरों का प्रारम्भ गर्भगृह के साथ हुआ जिनमें देव मूर्ति रखी जाती थी, जहाँ तक पहुंचने के लिए एक दालान होता था, जिसमें एक सभा भवन से होकर प्रवेश किया जाता था और सभा भवन का द्वार ड्योढ़ में खुलता था। गर्भगृह के द्वार और स्तम्भों को बेल पुष्प-पत्रादि द्वारा सजाया जाता था ' चौखट के ऊपरी दोनों सिरों पर गंगा और यमुना को अपने-अपने वाहन पर आरूढ़ आकृतियाँ बनायी जाती थी। इस पूरे भवन के चारों ओर एक प्राचीर युक्त प्रांगण होता था जिसमें आगे चलकर और अनेक पूजा गृहों की स्थापना होने लगी। गुप्तकाल से मन्दिर सामान्यतः ईंट अथवा लकड़ी के स्थान पर पत्थर के बनने लगे थे। पत्थर के प्रयोग से स्मारकीय शैली का विचार उत्पन्न हुआ और हिन्दू वास्तुकला में इस पर विशेष बल दिया जाने लगा । गुप्तकाल में प्रायः मन्दिरों की छतें सपाट होती थी किन्तु शिखरयुक्त मन्दिरों का निर्माण भी शुरू हो गया था। मन्दिर की बाहरी दीवारों पर अलंकरण नहीं होता था । मन्दसौर अभिलेख (473-474 ई) से विदित होता है कि दशपुर का सूर्यमन्दिर गगन चुम्बी बनाया गया । मन्दिरों के अवशेषों का अध्ययन करने से पता चलता है कि पार्वती मन्दिर में प्रासाद था। परन्तु नचना कथूरा में दो चौत्य खिड़कियों के समान प्राप्त हुए हैं जबकि गर्भगृह की खिड़कियाँ चौकोर बनी है और उनको नक्काशीदार जालियों से सजाया गया है। प्राय: मन्दिरों की स्थापना ऊँचे चबूतरे पर होती थी जिस पर चढ़ने के लिए चारों ओर सीढ़ियाँ होती थी।गुप्तकाल के प्रसिद्ध मन्दिर -
गुप्त काल के प्रसिद्ध मन्दिर निम्नलिखित थे।(1) भूमरा का शिव मन्दिर -
यह मन्दिर मध्यप्रदेश के प्राचीन नामोद राज्य में भूमरा नामक स्थान पर बना हुआ है इस मन्दिर का केवल गर्भगृह ही शेष बचा हुआ है गर्भगृह में एक मुखी शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग को रत्नजड़ित मुकुट पहने हुए प्रदर्शित किया गया है । शिव की जटाओं के मध्य अर्द्धचन्द्र अंकित है और मस्तिष्क पर तीसरा नेत्र प्रदर्शित किया गया है। गर्भगृहों के पाश्र्वो पर गंगा तथा यमुना प्रदर्शित की गई है। गर्भ गृह के द्वार की चौखट अनेक अलंकरणों से सजी हुई है प्रसिद्ध इतिहासकार पर्सी ब्राउन का कहना है कि बहुत कम ऐसी इमारतें हैं जिन पर इतना सुन्दर अलंकरण प्रदर्शित किया गया है जैसा कि भूमरा मन्दिर के चारों ओर विद्यमान प्रस्तरों पर प्रदर्शित किया गया है।”(2) तिगवा का विष्णु मन्दिर -
यह मन्दिर मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में तिगवा नामक स्थान पर स्थित है। इसकी बनावट बहुत ही साधारण है। इस मन्दिर में एक गर्भगृह बना है जिसके सामने एक मण्डप है। इसमें कई स्तम्भ हैं जिनके शीर्ष स्थान पर सिंह तथा पूर्ण कलश की आकृतियाँ बनी हुई हैं।Also Check:
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