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गुप्तकालीन कला और भवन निर्माण कला विषय पर टिप्पणी लिखिए।

गुप्तकालीन कला और भवन निर्माण कला विषय पर टिप्पणी लिखिए। 

गिफ्रिस का कथन है कि भावों के प्रदर्शन, करुणा की भावना और केवल भावनाओं द्वारा अपनी कहानी कहने की कला के इतिहास में यह चित्र बेजोड़ है। फ्लोरेंस का कलाकार अपने चित्रों में अजन्ता के चित्रों को अपेक्षा अधिक सुन्दर रूप दिखा सकता है वेनिस का कलाकार अपने चित्रों में अधिक रंग सकता है।
भर टुता है पर अजन्ता के चित्रों का भाव प्रकाशन विश्व का कोई भी कलाकार नहीं कर
अजन्ता का 17वा गुफा , चित्र व हा आजपर्ण सजीव तथा स्वाभाविक है। जा के चित्र क्रियाशील, आजपूण एवं कला का अत्यन्त सन्दर स्वरूप में दशति है।"
त्रा में महात्मा बुद्ध के गृह परित्याग का चित्र बहुत ही राजीव एवं स्वाभाविक है। विश्व का संभवत: महात्मा बुद्ध के सम्बन्ध में सबसे श्रेष्ठ काल्पनिक. चित्र है। पर। कल्पना का साभवत: नही दुहराया जा सकता। इस गुफा के चित्रों में माता तथा ५५ बित्र बहुत ही विरयात है। इस चित्र में महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा अपने पुत्र राहुल अपने पति को समर्पित करते हुई दिखाई गई है। इसी गफा के चित्रों में एक चित्र सम्राट को हर हर बातीलाप करते दिखाया गया है। सिर निवेदिता के कथनानुसार 17 वीं गुफा में स्वर्णहंस की वार्ता को सुनते हुए सम्राट का जो चित्र है उससे अधिक गन्दर चित्र विश्व में कहीं दूसरी जगह उपलब्ध नहीं है।”
एक चित्र सिंह, मृग और हाथी के आखेट का अंकित है जो बहुत ही चित्त को आकर्षित करने वाला है।

गुप्तकालीन संगीत कला - 

गुप्तकाल में संगीत कला का भी विकास हुआ। अनेक गुप्त सम्राट स्वयं संगीत प्रेमी थे । इस बात का प्रमाण समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के वे सिक्के हैं जिन पर वीणा अथवा अन्य वाद्यों के चित्र बने हुए हैं। वात्स्यायन ने संगीत का ज्ञान प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक बताया है। मालविकाग्निमित्रम् से ज्ञात होता है कि नगरों में संगीत की विद्या के लिए कला भवन होते थे । इमी ग्रंथ के अनुसार दास उस समय एक विख्यात संगीत आचार्य था । वात्स्यायन ने संगीत के तीन मुख्य भाग माने हैंगीत, वाद्य और नृत्य । गुप्त सम्राट अपने पुत्र पुत्रियों को संगीत की शिक्षा देते थे। कालिदास के ग्रंथों में भी संगीत शालाओं और संगीताचार्यों के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं।

गुप्तकालीन नृत्य कला - 

गुप्तकालीन गुफाओं के भित्ति चित्रों तथा साहित्यिक साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि यह कला भी उस समय पर्याप्त प्रगति कर सकी। मालविकाग्निमित्र में गणदास को नृत्य का आचार्य बताया गया है। बाघ गुप्त मन्दिरों के एक चित्र में नृत्य करने वाली दो मण्डलियाँ दिखाई गई हैं। प्रथम मंडली में एक नर्तक नाच रहा है और सात स्त्रियों ने उसे घेर रखा है। इनमें एक स्त्री मृदंग, तीन झांझ और बाकी तीन कोई
अन्य वाद्य यंत्र बजा रही हैं। दूसरी मंडली के मध्य में भी एक नर्तक नाच रहा है और छ: स्त्रियाँ विविध बाजे बजा रही हैं। सारनाथ में प्राप्त एक पत्थर पर भी ऐसा ही दृश्य उत्कीर्ण है। निःसन्देह इन साक्ष्यों की प्राप्ति के पश्चात् यह कहना गलत न होगा कि नृत्य कला भी गुप्तकाल में बड़ी प्रगति पर थी । सम्भवतः इस काल में उस वर्ष की कन्याओं को नृत्य की शिक्षा दी जाती थी।
(F) रंगमंच या नाटक - इस काल में कालिदास विशाखदत्त द्वारा लिखे नाटकों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस युग में रंगमंच विकसित था और उसके ऊपर नाटकों का अभिनय किया जाता था। रंगमंच के विभिन्न अंगों के नाम तथा अभिनय के प्रकारों की विस्तृत चर्चा तत्कालीन साहित्यिक रचनाओं में मिलती है । सम्भवत: भारत नाट्य शास्त्र का वर्तमान संस्करण गुप्तकाल का ही है जिसमें अभिनय के विविध अंगों का विस्तृत और विशद् विवेचन पाया जाता है। नाटकों के अभिनय का उच्च काल माना गया था। नाट्यशालाओं के लिए प्रेक्षागृह तथा रंगशाला शब्द मिलते हैं।

गुप्तकालीन मुद्रा निर्माण कला - 

गुप्तकाल में मुद्रा कला का भी अत्यधिक विकास हुआ। इस काल की मुद्रायें बहुत ही मनोरम तथा चित्त आकर्षक हैं। इन मुद्राओं का आकार तथा इन पर बनी मूर्तियाँ बड़ी ही भव्य हैं। गुप्तकाल की अधिकांश मुद्रायें स्वर्ण की बनी हैं किन्तु चाँदी तथा तांबे की मुद्राओं का भी प्रचलन इस युग में था। डॉ. रतिभानुसिंह नाहर का कथन है कि “गुप्त सम्राटों ने कलापूर्ण स्वर्ण मुद्रायें चलाई। उनकी मुद्राओं के आकार प्रकार की विभिन्नता इस कला की समृद्ध अवस्था का संकेत करती हैं। गुप्त सम्राटों के सिक्के निर्माण, सुघड़ता तथा रुचि की कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध है।”

गुप्तकालीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी -

 गुप्त काल में विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ और उनका संकलन वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी ग्रंथों में हुआ इसका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है। |

(i) गणित - 

गणित के क्षेत्र में हम इस दौरान आर्य भट्ट द्वारा रचित आर्य भट्टीयम् पाते हैं। वह पाटलिपुत्र का रहने वाला था। ऐसा प्रतीत होता है कि यह गणितज्ञ विभिन्न प्रकार की गणितीय गणनाओं में दक्ष था । आर्यभट्ट को गणित के क्षेत्र में विशेष स्थान केवल इसलिए नहीं है कि उसने सर्वप्रथम इससे सम्बन्धित समस्याओं को उठाया बल्कि इसलिए भी है कि उसके द्वारा बताये गये, बुनियादी गणित सिद्धान्तों का आने वाली शताब्दियों के गणितज्ञों ने भी अनुसरण किया। उसके ग्रंथ (आर्यभट्टीयम) में अंकगणित, बीजगणित तथा रेखागणित की भी विवेचना है। गणित में अंक स्थान, वृत्त और पाई () के मूल्य पर प्रकाश डाला है। पाई के वास्तविक मूल्य 3.14 का पता लगाया। सम्भवत: वर्गमूल, घनमूल इत्यादि निकालने की पद्धति जो आज उपलब्ध है ठीक उसी पद्धति का प्रचलन पांचवीं शताब्दी में आर्य भट्ट ने किया था । वृत्त और त्रिकोण की मुख्य विशेषताओं की विवेचना भी आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ में की थी।

(ii) ज्योतिष - 

गणित की तरह ज्योतिष के क्षेत्र में भी आर्य भट्ट का नाम सर्वाधिक चला। वस्तुतः वह पहला ज्योतिषी था जिसने 499 ई. में सबसे पहले गणित के साथ ज्योतिष की पहले की अपेक्षा अधिक बुनियादी समस्याओं को उठाया था। यह मुख्यतया उसी के प्रयासों का परिणाम था कि ज्योतिष को गणित से अलग शास्त्र माना गया। उसने हिसाब लगाकर सौर वर्ष की लम्बाई 365.3585805 दिन के बराबर बताया था। यह आरम्भ आधुनिक अनुमान के बहुत निकट है।

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