गुप्तकालीन भारतीय जनता के आर्थिक जीवन के बारे में तुम क्या जानते हो संक्षेप में विवरण दीजिए।
गुप्तकालीन भारतीय जनता के आर्थिक जीवन के बारे में तुम क्या जानते हो संक्षेप में विवरण दीजिए।
चन्द्रगुप्त प्रथम की मुद्राओं के आधार पर कहा जा सकता है कि वह एक चुस्त कोट और पायजामा पहनता था। वह सिर पर भी एक वस्त्र धारण करता था। कानों में कुण्डल तथा बाजुओं के बाजुबन्द पहनत। था। उनके समीप ही कुमार देवी एक ढीला वस्त्र पहिने हुए दिखाई गई है जो कुण्डल, हाटर तथा बाजुवन्द पहने हैं। यह भी सिर पर एक चुस्त प्रकार की टोपी पहने हुए हैं।समुद्रगुप्त के सिक्कों से पता चलता है कि वह किसी वस्तु का कवच प्राय: हर समय पहनता था। चन्द्रगुप्त द्वितीय के सिक्कों से जानकारी मिलती है कि वह धोती पहनता था। वह कटिबन्ध, भुजबन्द तथा कुण्डल जैसे आभूषण पहनता था । कालिदास के रघुवंश में पुरुषों और बालकों के लिए पगड़ी तथा शरीर के ऊपरी भाग को ढकने के लिए उत्तरीय का वर्णन है। कभी-कभी सारे शरीर को ढकने के लिए “दुकूल” नामक वस्त्र पहना जाता था। स्त्रियाँ मोती, जवाहरात, सोने-चाँदी के विभिन्न आभूषण पहनती थी । स्त्रियाँ स्थांमुक (या कूपशिक), अंशुक (स्कर्ट) तथा चुनरिया पहनती थी। स्त्रियाँ अपने बालों को विभिन्न प्रकार से सजाती थी। वे कई तरह के सुगन्धित तेल तथा अन्य पदार्थ प्रयोग में लाती थी। वे काजल, चन्दन, रंगीन लेपन आदि लगाती थी। | मनोरंजन - शिकार राजाओं एवं सामन्तों के मनोरंजन का एक महत्त्वपूर्ण साधन था। सर्वसाधारण लोग पासे और शतरंज का खेल खेला करते थे। भैंसों तथा मुर्गों की लड़ाइयों से भी मनोरंजन होता था। बच्चे तथा स्त्रियाँ गेंद से अनेक प्रकार के खेल खेला करती थी। नाटक, दंगल एवं दौड़े भी मनोरंजन के लिए आयोजित की जाती थी।
गुप्तकाल का धार्मिक जीवन
हिन्दू धर्म
(क) वैष्णव धर्म - गुप्तकाल में हिन्दू धर्म अथवा ब्राह्मणवाद प्रमुख हो गया था। दो देवताओं विष्णु और शिव की पूजा होने लगी थी । विष्णु का उदय भक्ति के देवता के रूप में हुआ और उसे वर्ण व्यवस्था के उद्धार कर्ता के रूप में दिखलाया जाने लगा। उसके विषय में असंख्य पौराणिक कथाएँ प्रचलित हो गई तथा उसके सम्मान में विष्णु पुराण नामक एक संपूर्ण पुराण का संकलन हुआ। इसी प्रकार इस देवता के नाम पर विष्णु स्मृति नामक एक विधि ग्रंथ प्रचलित हुआ । सर्वोपरि बात यह हुई कि चौथी शताब्दी ई. में प्रसिद्ध वैष्णव कृति भगवत् गीता सामने आई। इस पुस्तक ने भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति और प्रत्येक वर्ण को अपने लिए निर्दिष्ट कार्यों को करने की शिक्षा दी । गुप्त राजाओं के राजाश्रय से वैष्णव धर्म लोकप्रियता नै चरम सीमा पर पहुंचा। अनेक गुप्त नरेशों का व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म था । चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के समान अनेक गुप्त सम्राटों ने अपने सिक्कों पर नाम के साथ परम भागवत विशेषण का प्रयोग किया है। चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा समुद्रगुप्त के सिक्कों पर विष्णु के वाहन गरुड़ की प्रतिमा अंकित है। इसके अतिरिक्त मुद्राओं के ऊपर वैष्णव धर्म के अन्य प्रतीक शंख, चक्र, गदा, पद्म और लक्ष्मी भी प्राप्त होते हैं। गुप्त सम्राटों के काल में अनेक वैष्णव मन्दिरों का निर्माण हुआ। चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने महरौली में विष्णु ध्वज की स्थापना कराई थी। स्कन्दगुप्त के गवर्नर पर्णदत् के पुत्र चक्रपालित ने ऐतिहासिक सुदर्शन झील के तट पर एक विष्णु मन्दिर बनाया। गुप्त नरेश बुद्ध गुप्त के एक अभिलेख में विष्णु भगवान की प्रार्थना की गई हैं।(ख) शैव धर्म -
गुप्तकाल में वैष्णव धर्म के साथ-साथ शैव धर्म भी प्रगतिशील था। अनेक शिव मन्दिरों का निर्माण इस काल में हुआ । शाब और पृथ्वीषेण नामक दो ऐसे अमात्यों का उल्लेख गप्त सम्राटों के शिलालेख में होता है जिन्होंने शैव धर्म की प्रतिष्ठा का विचार करते हुए शैव मन्दिरों का निर्माण कराया था। सम्भवतः अपने नाम को चिरकाल तक अमिट बनाने के उद्देश्य से इन शैव मन्दिरों को इन्होंने निर्मित किया था। गुप्त सम्राटों के पूर्व भारशिव तथा वाकाटक राजा शैव धर्म को मानते थे। भारशिव नाम स्वयं इस तथ्य की पुष्टि कर देता है । गुप्तकाल के दौरान में भी वाकाटक, कदम्ब, मैत्रक एवं परिव्राजक वंशों के राजा प्रधानतया शैव धर्म के ही उपासक थे। शैव मन्दिरों में जहाँ एक ओर शिवलिंग की स्थापना की जाती थी वहीं पर दूसरी ओर जटाजूटधारी, सर्प, गंगा तथा चन्द्रमा से शोभित हुई शिव की सौम्यमूर्ति को भी प्रतिष्ठापित किया जाता था। उस काल के कुछ ऐसे भी सिक्के मिले हैं जिन पर प्रायः त्रिशूल तथा नन्दी के चित्र अंकित मिलते हैं। ये सिक्के सम्भवतः शैव धर्मावलम्बी राजाओं द्वारा चलाये गये थे।(ग) शाक्त धर्म -
शिव के साथ शक्ति की भी पूजा होती थी। शक्ति देवी पार्वती, दुर्गा, महिषमर्दनी इत्यादि नामों से भी प्रख्यात थी। उदयगिरि की एक गुफा में महिषासुर का वध करती हुई दुर्गा की एक सुन्दर मूर्ति है। इसी स्थान पर दुर्गा के अन्य रूपों की भी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। भूमरा में महिषमर्दनी की छ:भुजायें दिखाई गई हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट है। कि गुप्तकाल में शक्ति पूजा का भी काफी प्रचार था।(घ) सूर्य पूजा -
सूर्य वैदिक देवता था, किन्तु गुप्तकाल में इसकी भी पूजा चल रही थी । कुमार गुप्त के मन्दसौर अभिलेख में बड़ी सुन्दर संस्कृत भाषा में इस देवता की स्तुति की गई है। इस अभिलेख से प्रकट होता है कि मालवा में जुलाहों की श्रेणी ने एक पुराने सूर्य मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया था। स्कन्द गुप्त के इन्दौर के एक ताम्रपत्र में सूर्य भगवान की उपासना की गई है। वैशाली तथा भीटा की अनेक मोहरों पर “भगवतः आदित्यस्य लिखा हुआ है।Also Check:
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