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“गुप्तकाल कला और साहित्य का स्वर्णयुग था।” इस वक्तव्य की पुष्टि कीजिए? ।

“गुप्तकाल कला और साहित्य का स्वर्णयुग था।” इस वक्तव्य की पुष्टि कीजिए? ।

गुप्तकाल एक ऐसा काल था जो प्राचीन भारत के इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इस काल में साहित्य, कला एवं विज्ञान की काफी उन्नति हुई। गुप्तकालीन सम्राट केवल अपने साम्राज्य विस्तार हेतु ही प्रयत्नशील नहीं थे वरन् उन्होंने साहित्य एवं कला के पोषक एवं संरक्षक का कार्य भी किया। उन्होंने विशाल साम्राज्य की स्थापना कर शान्ति व व्यवस्था बनाये रखी । अतः साम्राज्य में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित होने एवं गुप्त सम्राटों के प्रोत्साहन के कारण साहित्य, कला, विज्ञान आदि क्षेत्रों में आश्चर्यजनक उन्नति

(A) गुप्तकालीन साहित्य - 

गुप्तकाल शान्ति और सुव्यवस्था का युग था ऐसे समय में साहित्य का विकास होना स्वाभाविक ही था। गुप्तकालीन साहित्यिक प्रगति को स्वीकार करके ही डॉ. बारनेट (Barnett) ने ठीक ही लिखा है कि "प्राचीन भारत के इतिहास में गुप्तकाल का वही महत्त्व है जो यूनान के इतिहास में पेरिकिलयन युग का है। डॉ. स्मिथ ने इस काल की तुलना ब्रिटिश इतिहास के एलिजाबयेन तथा स्टुअर्ट युगों से की है। गुप्तकाल धर्म निरपेक्ष साहित्य की रचना के लिए उल्लेखनीय है ।।

(1) नाटक - 

गुप्तकाल में ही भास ने अपने तेरह नाटक की रचना की। परन्तु गुप्तकाल को वास्तविक प्रसिद्धी कालिदास की कृतियों के कारण ही प्राप्त हुई । कालक्रम की दृष्टि से उसका प्रथम नाटक मालविकाग्निमित्रम् माना जाता है। यह नाटक गुप्त इतिहास पर आधारित है। कालिदास की रचनाओं में अभिज्ञान शाकुन्तलम सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। जिसकी गणना विश्व की सौ सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों में होती है। यूरोपीय भाषाओं में अनुवादित होने वाली यह सर्वप्रथम कृति थी ऐसी दूसरी कृति भगवद् गीता थी। इस काल में नाटकों के सम्बन्ध में दो बातें उल्लेखनीय हैं।
(1) इस काल के सभी नाटक सुखान्तक हैं हम इस काल में कोई भी नाटक दुद्धान्त नहीं पाते ।
(2) उच्च और निम्न वर्गों के पात्र एक ही भाषा नहीं बोलते इन नाटक में आने वाली नारी और शूद्र पात्र प्राकृत का प्रयोग करते हैं।

अभिज्ञान शाकुन्तलम

अभिज्ञान शाकुन्तलम साहित्य एवं नाटक दोनों दृष्टियों से चरम उपलब्धि माना जाता है। इसकी विषय-वस्तु राजा दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन है। इसकी कथा महाभारत से ली गई है परन्तु प्रणय दृश्यों में मौलिकता है। कालिदास का नाम नाटककार की दृष्टि के साथ-साथ कवि के रूप में भी उल्लेखनीय है। उनके काव्य ग्रंथ हैं ऋतु संहार, मेघदूत, कुमार सम्भव तथा रघुवंश । कालिदास ने अपने काव्य ग्रंथों तथा नाटकों में मानव भावनाओं का अद्वितीय चित्रण किया है। अभिज्ञान शाकुन्तलम के अतिरिक्त उनका अन्य उल्लेखनीय नाटक विक्रमोर्वशीय है जिसमें उर्वशी पुरखा की कथा को मर्त्य राजा विक्रम और अप्सरा उर्वशी की प्रेम कहानी का रूप दे दिया गया है।

शूद्रक रचित मृच्छकटिकम 

शूद्रक रचित मृच्छकटिकमनामक नाटक गुप्तकालीन नाटकों की विषय-वस्तु की दृष्टि से अपवाद माना जाता है क्योंकि यह नाटक अन्य नाटकों में समान नहीं है। विषय-वस्तु की दृष्टि से इसने राजकीय जीवन और महाकाव्यों के प्रसंगों की उपेक्षा की है। इसका नायक दरिद्र ब्राह्मण सार्थवाह, चारुदत्त और नायिका बसन्त सेवा नामक गणिका है। इसमें विभिन्न पात्रों द्वारा बोली विभिन्न क्षेत्रीय भाषाएँ हैं जो यथार्थ जीवन पर आधारित प्रतीत होती हैं। इस नाटक में लेखक ने भाव तथा कर्म का सन्तुलन तथा करुणा एवं हास्य का सामंजस्य बनाये रखा है। इस नाटक में विभिन्न पात्रों के माध्यम से सभी सामाजिक कार्यों का बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है। भाषा और भाव की दृष्टि से यह नाटक महत्त्वपूर्ण होने के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी उपयोगी है।

विशाखदत्त

विशाखदत्त ने दो नाटकों की रचना की -(1) मुद्राराक्षस एवं (2) देवीचन्द्रगुप्तम् | मुद्राराक्षस एक ऐतिहासिक नाटक है जिसमें घटनायें वास्तविकता एवं सजीवता के साथ चित्रित हैं। इसमें कौटिल्य (चाणक्य) की योजनाओं का वर्णन हैं। देवी चन्द्रगुप्तम (जिसके कुछ ही अंश प्राप्त होते हैं ) एक ऐतिहासिक नाटक है जिसमें चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा शक राजा तथा अपने भाई रामगुप्त की हत्या तथा अपनी विधवा भाभी ध्रुव देवी के साथ विवाह का वर्णन है।

(ii) काव्य - 

गुप्तकाल में अनेक कवि हुए जिन्होंने अनेक काव्य ग्रंथों की रचना की। गुप्तकालीन सर्वश्रेष्ठ कवि कालिदास, शूद्रक तथा विशाखदत्त के अतिरिक्त भारवि, भट्टि मातृगुप्त मातृभेट, कुमारदास, माघ आदि के नाम भी उल्लेखनीय हैं। कालिदास ने अपनी काव्य रचनाओं में वैदर्भी शैली का प्रयोग किया है, उन्होंने अलंकारों का प्रयोग बड़ी कुशलता के साथ किया है। उपमा के प्रयोग में तो वे अनुपम तथा अद्वितीय हैं। मनोवैज्ञानिक चित्र के चित्रण में भी वे बेजोड़ हैं। उन्होंने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का वर्णन बड़ी ही कुशलता के साथ किया है। डॉ. आर. सी. मजूमदार का कथन है” कालिदास गुप्तकाल के साहित्य आकाश पर सबसे चमकदार नक्षत्र है । जिन्होंने अपना प्रकाश सारे संस्कृत साहित्य पर डाला है। वह सर्वसम्मति से महान् कवि एवं नाटककार हैं और उनकी कृतियाँ सब युगों में अत्यन्त प्रसिद्ध और सर्वप्रिय रही हैं। एक अन्य इतिहासकार के अनुसार “उनकी कल्पना की ऊंचाई शब्दों का मधुर संगीत भावों की कवित्वपूर्ण अभिव्यंजना, भाषा का प्रसाद गुण तथा उपमाओं की चित्रमयता एवं सांगोपांगता आदि महाकवि के काव्य के विशिष्ट गुण हैं।”

गुप्तकाल के साहित्य

 सर्व इतिहासकार प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को सर्वश्रेष्ठ कवियों का काल मानते हैं। हरिषेण उनमें से महत्त्वपूर्ण हैं। हरिषेण महादण्डनायक ध्रुवभूति का पुत्र था। वह समुद्रगुप्त के शासनकाल में सन्धि विग्रहिक, कुमारामात्य तथा महादण्डनायक था। प्रयाग प्रशस्ति पर अंकित समुद्रगुप्त की दिग्विजयों की प्रशस्ति उसकी शैली का एकमात्र उदाहरण है वह प्रतिभा सम्पन्न कवि था और उसकी सरल अलंकारिक शैली काव्य कुशलता का प्रमाण है। उसके छन्द कालिदास की शैली की याद दिलाते हैं। यह पूरा लेख गद्य पद्य की मिश्रित शैली में है।

एहाले प्रशस्ति (634ई) 

एहाले प्रशस्ति (634ई) में कालिदास के साथ भारवि का नाम मिलता है और काशिकावृत्ति (650ई) में भारवि के उद्धरण प्राप्त होते हैं। काव्य लोक के नक्षत्रों में महत्व की दृष्टि से इसे द्वितीय स्थान दिया गया है। इनका एक मात्र ग्रंथ किरातार्जुनीय पौराणिक काव्य महाभारत पर आधारित है। इसमें अर्जुन और किरात के युद्ध का वर्णन है। इस ग्रंथ को पढ़ने से पता चलता है कि भारवि की वर्णन शक्ति बहुत ही विलक्षण थी। उनकी शैली में एक प्रकार की शान्त गरिमा है। साथ ही वह प्रकृति के सौन्दर्य के निरीक्षण एवं चित्रण में भी सिद्धहस्त था। इसी काल में भट्टि ने भट्टिकाव्य या रावणवध की रचना की। इस ग्रंथ की रचना बल्लभी के शासक श्रीधरसेन के काल में की गई। 

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