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गुप्तकालीन भारत की सामाजिक अवस्था का वर्णन कीजिए।

गुप्तकालीन भारत की सामाजिक अवस्था का वर्णन कीजिए।

(ड.) चाण्डालों की स्थिति - इस काल में चाण्डालों की संख्या में वृद्धि हुई । चंडाल भारतीय समाज में पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में प्रकट हुए। पाँचवीं शताब्दी तक उनकी संख्या इतनी बढी तथा नियंग्यताएँ इतनी स्पष्ट हो गई थी कि उन्होंने चीनी यात्री फाह्यान का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। वह अपने यात्रा वर्णन में लिखता है कि वे लोग नगर तथा गाँव से बाहर रहते तथा गोश्त का धन्धा करते थे। उनसे नगर तथा गाँववासी सामाजिक सम्बन्ध नहीं रखते थे और उनकी छाया तक से बचते थे। नगर और गाँव में आने के समय वे लकड़ी से पीपा या कोई अन्य वस्तु बजाते थे जिससे लोग इनसे अलग हट जाएँ।

(च) वर्ण व्यवस्था के अन्य उल्लेखनीय परिवर्तन -

(i) गुप्तकालीन साहित्यिक स्रोतों के विस्तृत अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि इस काल में परम्परागत ढंग से चार वर्गों के लिए निर्धारित व्यवसाय का बन्धन शिथिल होने लगा था।” ब्राह्मण राजवंशों के प्रमाण मिलते हैं जैसे वाकाटक तथा कदम्ब । ब्राह्मण राजा और योद्धा हो सकते थे । केवल ब्राह्मण ही नहीं अपितु वैश्य और शूद्र वंशज राजाओं का वर्णन भी है। गुप्तवंश के सम्राट सम्भवत: वैश्य थे। सौराष्ट्र अवन्ति और मालवा में शूद्र राजाओं की चर्चा इस काल में मिलती है। इन चार वर्गों का आधार गुण और कर्म न होकर जन्म ही था, अत: मनुष्य का कर्म चाहे जो भी हो उसे उसी वर्ण को माना जाता था, जिसमें उसका जन्म हुआ था।
(ii) चारों वर्गों के लिए पृथक-पृथक सामाजिक स्तर बनाये रखना ही उचित समझा गया । वाराहमिहिर ने वृहत्संहिता में चारों वर्षों के लिए विभिन्न स्तरों के आवासों की व्यवस्था की है। उसके अनुसार ब्राह्मण के घर में पाँच, क्षत्रिय के घर में चार, वैश्य के घर में तीन और शुद्र के घर में दो कमरे होने चाहिए।
। (iii) इस काल में चार प्रमुख वर्ग अनेक जातियों व उपजातियों में विभाजित हो गये । इसके दो कारण थे । एक ओर बड़ी संख्या में विदेशियों को भारतीय समाज में आत्मसात कर लिया गया और विदेशियों के प्रत्येक समूह को एक प्रकार की हिन्दू जाति मान लिया गया । चूंकि विदेशी मुख्य रूप से विजेताओं के रूप में आए, इसलिए उन्हें समाज के क्षत्रियों का दर्जा दिया गया जातियों की संख्या बढ़ने का दूसरा अनेक कबीलाई जनगणों को भूमि अनुदानों द्वारा हिन्दू समाज में पचा लिया जाता था। ववीलों के शासक प्रधानों को प्रतिष्ठा योग्य मूल का कहा गया। लेकिन शेष कबीलाई जनता को निम्न मूल का बतलाया गया । इस प्रकार प्रत्येक कबीला हिन्दू समाज की एक जाति बन गया।

गुप्तकालीन भारत की सामाजिक अवस्था

(iv) गुप्तकालीन अभिलेखों में कायस्थ जाति का उल्लेख प्राप्त होता है इस की गणना किसी उपजाति में नहीं थी। प्रथम कायस्थ प्रान्तीय सभा का एक सदस्य होता था। इतिहासकार ओझा के मतानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि जो लेखक का अहल्कार या कार्य करते थे । कायस्थ कहलाते थे।” यह भी कहा गया है कि भूमि तथा भू-राजस्व के हस्तांतरणके कारण कायस्थ जाति का जन्म हुआ जिन्होंने ब्राह्मण लेखकों के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। इसीलिए गुप्तकालीन ब्राह्मण रचनाओं में कायस्थों के प्रति कटु तथा अपमानजनक विचार प्रकट किए गए। इस जाति के लोग मूलत: सरकारी सेवाओं से सम्बन्धित थे । उनका सर्वप्रथम उल्लेख याग्यवक्य ने किया है। इसके साथ ही उनके बारे में गुप्तकालीन अभिलेख भी प्रमाण देते हैं। उनके मुख्य कार्य थे -लेखक या क्लर्क के रूप में हिसाब-किताब करना, गणना, आयव्यय और भूमिकर के अधिकारी के रूप में कार्य करना । विद्वानों की राय है कि गुप्त काल में कायस्थों का अस्तित्व एक वर्ग (Class) के रूप में था, जाति (Caste में नहीं था।

गुप्तकाल में दास प्रथा - 

गुप्तकाल में दास-प्रथा प्रचलित थी । निसन्देह सभी शूद्र दास । परन्तु चूंकि दास-प्रथा प्रचलित थी, इसलिए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता गुप्तकाल में कुछ शूद्र दास थे । दास-दासियों से युक्त राज्य का भोग करना उत्कट से का फल माना जाता था। “शान्ति पर्व में कहा गया है कि ईश्वर ने शूद्रों की रचना के अन्य तीन वर्षों के दास के रूप में की है। इसी ग्रन्थ में शूद्रों को दास धर्म के पालन उपदेश दिया गया है। नारद ने दास के 15 प्रकार बताए हैं जिनमें से प्रमुख प्रकार निम्न हैं।
1.प्राप्त किया हुआ दास,
2,स्वामी द्वारा प्रदत्त दास,
3.ऋण न चुका सकने के कारण बना दास,
4. आत्मविक्रमी दास,
5. दासी के प्रेम में फंसकर बनने वाला दास,
6.अपने को एक निश्चित समय के लिए बनाने वाला दास,
7.दाँव पर हारने वाला दास तथा ।
8. स्वयं दासत्व ग्रहण करने वाला दास ।
नारद तथा बृहस्पति दोनों ने यह स्पष्ट किया कि दास केवल अपवित्र कार्यों में लगाए जाते थे। इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि गुप्तकाल में मौर्यकाल तथा उसके पूर्व के काल की तरह किसी उत्पादन कार्य में लगाया गया है। इस काल के साहित्यिक स्रोतों में कहा गया है कि दास- स्वामी के वर्ण से नीचे वर्ण का होना चाहिए। इस कथन से स्पष्ट है कि ब्राह्मण को दास नहीं बनाया जा सकता । ब्राह्मणों को छोड़कर दास अन्य तीनों वर्गों के हो सकते थे। जैन ग्रन्थों के आधार पर कहा जा सकता है कि आदिम जातियों से भी दास तथा चेरियाँ ली जाती थीं । कोई दासी अपने स्वामी के पुत्र तथा दासों को गुप्तकाल में पूर्व कालों की तरह बेड़ियों से बाँधा तथा पीटा जा सकता था। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि भारत में दासों के साथ रोम की तरह दुर्व्यवहार (शेर या अन्य जंगली जानवरों से लड़ाना एवं मनोरंजन) नहीं किया जाता था, सम्भवत: इसीलिए विदेशी यात्री इसके अस्तित्व का पता भी नहीं लगा सके।

गुप्तकाल में स्त्रियों की स्थिति 

(क) कई दृष्टियों से स्त्रियों की दशा में सुधार गुप्तकालीन साहित्य व कला के साक्ष्यों को अगर सही एवं विश्वसनीय मान लिया जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि इस काल में कई दृष्टियों से उनकी स्थिति सुधरी । उन्हें इस काल में विधवा होने पर विवाह की अनमति प्राप्त थी । गुप्तवंश के सबसे प्रसिद्ध राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने अपनी विधवा भावज ध्रुव देवी (रामगुप्त की पत्नी) से विवाह किया था। प्राय: वंशावलियों में पिता के साथ माता का भी उल्लेख किया जाता था। प्रभावती गुप्ता जैसी योग्य रानिया राज्य का संचालन करती थी । साहित्यकारों ने नारी की मर्यादा और सम्मान का विस्तृत वर्णन किया है। महाभारत में पत्नी के बिना जीवन शून्य माना गया है। इसमें भार्या को समस्र रोगों और दुखों को निदान माना गया है। रघुवंश में अज ने अपनी प्रिया को सखी, सचिव तथा प्रिय शिष्या कहा है। स्वप्नवासवदत्तम् में उदयन वासवदत्ता को “प्रिये तथा प्रिय शिष्ये' कहता है । वस्तुत: गुप्त काल में पत्नी अपने पति की सहधर्मिणी मानी जाती थी।

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