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शक, कलिंग का खारवेल और उसकी उपलब्धियाँ ।


उत्तर—पहली शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानियों (बैक्ट्रियनों) के भारत राज्य का अन्त हो । गया। उसके स्थान पर शक नामक एक अन्य विदेशी जाति ने भारत में अपना राज्य स्थापित किया। शक मध्य एशिया के सीक नदी के उत्तर में जेग्जिटिज' के निकट रहने वाली एक घुमक्कड़ जाति थी। इन्हीं के समीप पश्चिमी चीन में यहूची' नामक एक अन्य जाति रहती थी लगभग 175 से 195 ई.पू. में यहूचियों पर एक अन्य घुमक्कड़ हूँगनू (हूण) जाति के लोगों ने आक्रमण कर दिया । परिणामस्वरूप यहूचियों को अपना मूल स्थान छोड़ना पड़ा और । उन्होंने शकों पर आक्रमण करके उनको उनके मूल स्थान से खदेड़ दिया। यहाँ से ये लो। पश्चिम की तरफ गये । इसिक कुल झील से ये लोग दो समूहों में बँट गये । उनका एक सम् पूर्वी ईरान तथा पार्थिया होता हुआ शक स्थान पर आकर बस गया और फिर वहाँ से कन्द और बलूचिस्तान होता हुआ सिन्धु नदी की निचली घाटी में आकर बस गया । शकों का दूसरा । समूह सीधा भारत की ओर बढ़ा और किपिन (कपिशा) बैक्ट्रिया के दक्षिण पूर्व में स्थिरि । काबुल घाटी के उत्तर में कुपिशा नामक स्थान पर आकर बस गया । कालान्तर में इन्हीं स्थान । के केन्द्र बनाकर ईसा पूर्व की पहली शताब्दी से शकों ने भारत पर आक्रमण कर एक विशाल धू-भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। और ईस्वी सन् की तीसरी शताब्दी तक यहाँ शास. किया।

भारत पर शकों के आक्रमण डॉ. राजबली पाण्डेय के अनुसार शकों को भारत पर आक्रमण लगभग 71 ई. पू. में हुआ। डॉ. पाण्डेय ने भारत पर शक आक्रमणों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार दिया है।
(1) शकों को भारत पर प्रथम आक्रमण जैन ग्रंथ कालकाचार्य कथानक और दूसरी अनुभूतियों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि भारत पर शकों ने किस प्रकार आक्रमण किया। इन ग्रंथों एवं अनुश्रूतियों के अनुसार जैन आचार्य कालका उज्जयिनी के सम्राट गर्दभिल्ल के अत्याचारों से परेशान होकर उसका विनाश करने के लिए पार्थिया साम्राज्य के भीतर शक जातियों के पास चले गये । उधर पार्थियों का सम्राट शकों से अप्रसन्न था। अतः पाथिया सम्राट ने शक सरदारों के नाम एक संदेश भेजा जिसमें कहा गया कि यदि शक अपने परिवारों को नष्ट होने से बचाना चाहें तो अपना सिर काटकर उसके पास भेज दें । जैन आचार्य कालका ने शकों को अपने पक्ष में करने का यह अच्छा अवसर समझा और उनसे कहा कि तुम लोग अपना सिर क्यों कटवाते हो चलो सिन्धु देश और जैन आचार्य कालका के कहने से 96 शक सरदारों ने भारत पर आक्रमण किया । बोलन द से उतर कर पहले उन्होंने सिन्धु के गणराज्यों और यवन सत्ता के अवशेषों को ध्वस्त किया । इसके पश्चात् सुराष्ट्र के गणराज्यों को समाप्त कर शक वंश की स्थापना की । कुछ माह पश्चात् लाटके नरेशों को विजित करते और उन्हें अपने साथ लेते हुए अवन्ति पर आक्रमण किया। युद्ध में उज्जयिनी नरेश गर्दभिल्ल को पराजय का मुंह देखना पड़ा साथ ही उसे अपने राज्य से हाथ धोना पड़ा इस तरह अवन्ति पर भी शकों ने अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। अवन्ति पर शकों ने 14 वर्ष तक शासन किया तथा गर्दभिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य से परास्त होकर उज्जयिनी को त्यागना पड़ा विक्रमादित्य एक कुशल प्रशासक था उसने सार्वभौम राजा की तरह शासन किया और विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन किया। शक भी अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे थे, अतः उन्होंने 135 वर्ष पश्चात् भारत पर दूसरा आक्रमण किया और अवन्ति को विजित कर शक संवत् चलाया।
(2) शकों का दूसरा आक्रमण-शक अपने पहले आक्रमण में सफल नहीं हुए। हालाँकि उन्होंने मालवा (अवन्ति) और उसके आस-पास के प्रदेशों को विजित किया लेकिन वे यहाँ अधिक समय तक नहीं ठहर सके। और उनका एक समूह सिन्धु के मार्ग से उत्तरापथ पहुँच गई और 135 वर्ष बाद 78 ई. में शकों ने अपनी पूर्ण सैनिक शक्ति के साथ भारत पर दूसरा आक्रमण किया। इस आक्रमण में उन्होंने अवन्ति, सुराष्ट्र, लाट और महाराष्ट्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। शक की कई शाखाओं ने भारत के अलग-अलग प्रान्तों में शासन किया। केई इतिहासकारों का मत है कि इनका विस्तार, स्थायित्व और प्रमुख यूनानियों और बाख्त्री यूनानियों से भारतीय इतिहास में अधिक था।
भारतीय शक राज्य और उनके शासक जॉन मार्शल के मतानुसार भारत में शकों का सबसे पहला शासक माओज था। भारत में शकों के प्रथम शासक माओज ने सीस्तान व कंधार पर मिथ्रडेटस द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् शासन किया। जबकि वहाँ शकों के मुकाबले की कोई शक्ति नहीं थी, माओज एक शक्तिशाली राजा था। इसके राज्य में काश्मीर, पश्चिमी पंजाब तथा गान्धार प्रदेश सम्मिलित था। क्षत्रप पटिका से ज्ञात होता है कि तक्षशिला उसके अधीन थी और तक्षशिला उसके राज्य का मुख्य केन्द्र था । माओज के साम्राज्य के विस्तार के संबध में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने मत दिये हैं। प्रबंध चिन्तामणि में उल्लेख है कि शकों
जायना के राज्य गर्दभिल्ल को परास्त कर वहाँ अपना राज्य स्थापित किया था। टाने का मत है कि मालवा विजा माओज ने ही किया था। टार्न ने मुद्राओं के साक्ष्य के आधार पर अपना यह मत भी व्यक्त किया कि माओज ने सिन्धु नदी पर यवन समुद्री बेड़े को परास्त कर सिन्धु मार्ग को अपने नियन्त्रण में ले लिया था।
माओज के बाद एजेस प्रथम शक राज्य का शासक बना । उसने माओज शैली की मुद्राओं के अतिरिक्त कुछ अन्य मुद्राएँ भी प्रसारित की जो यवन सम्राट अपोलोडोटस और मेनाण्डर की मुद्राओं की शैली की थी, इससे स्पष्ट होता है कि उसने यवन सम्राट हिपस्टेिटस से पूर्वी पंजाब छीनकर यवनों की शक्ति बिल्कुल नष्ट कर दी । साकल सम्भवतः उसके राज्य का अंग बन गया । इतिहासकारों का यह भी मानना है कि एजेस प्रथम का राज्य मथुरा तक फैल गया था। लेकिन कुछ समय के पश्चात् एजेस प्रथम को उसके एक अधीनस्थ सामन्त एजलिसिज ने राजसिंहासन से हटा दिया और वह स्वयं शकों के भारतीय राज्य का शासक बन बैठा। इस तथ्य की जानकारी उस समय की प्राप्त मुद्राओं से होती है उस समय के प्राप्त सिक्कों में सामने की तरफ एजेस प्रथम का नाम यूनानी लिपि में है तथा पीछे की तरफ एजलिसिज का नाम खरोष्टी लिपि में हैं। इससे स्पष्ट होता है कि एजलिसिज एजेस प्रथम के अधीन था। इसने लगभग 12 वर्ष तक शासन किया। इसके बाद एजेस द्वितीय शासक बना। यह अन्तिम शक राजा था। यह पहले तो एजलिसिज के अधीन शासन के रूप में रहा तथा उसके बाद वह स्वतंत्र शासक बन गया। इसका प्रमाण एजेस प्रथम व एजलिसिज जैसी मुद्राओं की प्राप्ति है। उसने करीब 43 ई. पू. तक शासन किया। किन्तु इसके बाद पल्लव (पार्थियन) नामक फायोटीज ने तक्षशिला पर अधिकार कर लिया। जिसे हटाकर बाद में पल्लव शासक गोन्डोफर्नीज ने एजेस द्वितीय के राज्य पर अधिकार कर लिया और इस तरह तक्षशिला से शकों के अधिकार का अन्त हुआ।

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